धनबाद से रत्ना वर्मा का वसन्त गीत

बसंत गीत

ओ –ओ -आ– ह –ह देखो रूत बसंती आई ,
हरी पत्तियों के बीच पीलीपत्तियों का समागम आखिर कब तक रोके विरहन अपना मन !

टेशु दमके वन में ,
ज्वाला उठे विरहन के तन में-
सखी री देखो रूत बसंती आयी ।।

नशा हर डाल हर पात – पात में —
विरहन का मन डोले हौले-हौले—
प्रवाह नदी की करती मस्त हिलोरे–
सुगंध फूटता हिना सा तन मन बौराई—
सखी री रूत बसंती आयी ।।

कहती विरहन कोई छेड़ों सरगम –‘
रूत मिलन की आई —
सुन महुए की धुन— कोयल गीत सुनायी —
आग लगे तन मन में—
पीली सरसों गदरायी — नेह लगा एक
अज़नबी से — रूत बसंती आयी—।।

प्रेम बिना जीवन सुना —कहत मदन मस्त हो कर —
असर कर गयी अमलतास–गुलमोहर से गले मिलकर –
प्रेयसी बदहवास मदार के फूलों पर
बूँद बूँद टपके रस शबनमी–सखी री
देखो रूत बसंती आयी। ।

स्वरचित मौलिक रचना
रत्ना वर्मा
धनबाद – झारखंड

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14 Comments

  1. हमारी कविता को स्थान देने हेतु-माननीय युवा प्रवर्तक संपादक आदरणीय देवेद्र सोनी जी को हार्दिक प्रकट करती हूँ ।

  2. बसंती रुत सी कविता जी को भा गई … कवियित्री को बधाई |💐

    • जी आपकी प्यारी प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से शुक्रिया भाई महावीर सिंह जी

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