बलसाड़, गुजरात से श्यामजी मिश्रा का लेख – अगर देश की जनता को भूखे पेट भजन करने को कहा जायेगा तो तय समझिए की वो अपना आपा खो देगा

आलेख –

अगर देश की जनता को भूखे पेट भजन करने को कहा जायेगा तो तय समझिए की वो अपना आपा खो देगा

“मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती..”, यह प्रसिद्ध गीत हमें किसानों के जीवन में उनके कठोर परिश्रम से उपजे खुशियों की याद दिलाता है; लेकिन आज ये खुशियाँ दिन-बदिन उससे कोसों दूर जाती हुई प्रतीत होती हैं। आज धरती माता अपने ही पुत्र की रक्षा कर पाने में असमर्थ है। लेकिन इस तथाकथित मानवता को जरा भी शर्म नहीं आएगी। आये दिन कोई न कोई किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहा है । इस पर सरकार कोई भी कारगर उपाय कर पाने में पूरी तरह से असमर्थ रही है। अभी हाल ही में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी और अपने अपने वादों के मुताबिक किसानों का कर्ज माफ कर दिया, परंतु जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में तो कर्ज माफी के नाम पर किसानों के साथ ऐसा भद्दा मजाक किया जा रहा है कि जिन किसानों ने कर्ज लिया था उन किसानों में से किसी का 40 रूपया तो किसी का 50 रूपया इस तरह से किसानों का कर्ज माफ किया गया है। देखा जाए तो अपने देश के बड़े नेता अक्सर उन बड़े लोगों की ही बात करते हैं और गरीबों किसानों की बात करने के लिए उनके पास समय नहीं है। बड़े लोगों की तकलीफें उनकी महत्वाकांक्षाएं, उन पर लगे आरोपों और सुख-दुख पर तो हर कोई बात करता है लेकिन आम आदमी व गरीब किसान की बात करना फैशन में नहीं है। उनके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। आम आदमी हो या गरीब किसान वह अपनी तकलीफों के समाधान के लिए वोट देता है। उसी वोटों के दम पर सरकारें बनती है, और कुछ लोग अचानक बड़े लोग बन जाते हैं और इन्हीं के सह पर भ्रष्टाचार होता है और तब इसी भ्रष्टाचार को लेकर संसद से लेकर मीडिया हाऊ में बहस होने लगती है। यानी आम आदमी से शुरु हुई बात किसी बड़े आदमी के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आकर अटक जाती है। आम आदमी को कैसे सुख पहुंचाया जाये, आम आदमी के जीवन को कैसे अच्छा किया जाए, इस बारें में देश का कोई भी नेता नहीं सोचता। भारत में 5 करोड़ लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं, और दूसरी तरफ अपने देश में हर साल 2 करोड़ 10 लाख टन अनाज बर्बाद होता है। भूख और प्यास से उन्हें कैसे बचाया जाए,आखिर इन बातों पर लोग बहस क्यों नहीं करते । जबकि ऐसा होना चाहिए कि आम आदमी की समस्याओं पर चर्चा हो और जहां तक घोटालों की बात है तो घोटालों की जांच सिर्फ जांच एजेंसियों को सौंप देनी चाहिए और उसके बाद नतीजा निकलने तक इंतजार करना चाहिए। खैर अब तो सरकार ने अपनी बजट पोटली से कई धारदार हथियार निकालकर वोटरों को काटने का प्रयास किया है, अब देखना यह है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में इस बजट रूपी हथियार से वोटर कटते हैं या नहीं।

यह सब जानते हैं कि हमारा देश मजबूत तब होगा, जब देश के किसान मजबूत होंगे। देश के गरीब किसानों को वोट बैंक समझने की जरूरत नहीं है। वोट लेते समय तो नेताओं को किसानों की याद आती है, पर सत्ता मिलने के बाद वो किसानों को भूल जाते हैं। अब तक किसानों के उत्थान लिए सैकड़ों योजनाएं बन चुकी हैं, कुछ कागजों पर ही दम तोड़ बैठीं तो कुछ अपने आप ही खत्म हो गईं, इनमें नेताओं की बेईमानी साफ दिखती है। देश की आजादी के 70 साल बाद भी आज का किसान बेहाल नजर आ रहा है। ऐसा इसलिए होता है कि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अर्थव्यवस्था के अंतिम छोर पर खड़े आदमी तक नहीं पहुंच पा रहा है, यह अपने देश का दुर्भाग्य है कि ऐसा नहीं हो रहा है। अब तो संसद से लेकर सड़क तक सभी दल अपनी अपनी राजनीतिक एजेंडे चमकाने में लगे हैं। पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के सांसद अपने अपने नेताओं को खुश करने में लगे हुए हैं। जो कि यह दुखद भी है और अपने देश का दुर्भाग्य भी। यह दुख आज का नहीं है, यह तो 70 सालों से दुख है। ऐसा दुख की मरता ही नहीं। सरकारें चली जाती हैं और नई आ जाती हैं। दुख वहीं का वहीं रहता है। दुख नहीं बदलता बल्कि सरकारें बदल जाती हैं। आप खुद अनुमान लगा लें, जब यूपीए की सरकार थीं यानी मनमोहन सिंह की तब और अब एनडीए की सरकार है यानी नरेंद्र मोदी की तब, क्या फर्क पड़ा है। वही मंहगाई है, वही ट्रैफिक की समस्या है, वही बेरोजगारी है जो पहले थी। आम आदमी का जीना मुहाल है। क्या बदला है ? स्कूलों में डोनेशन और जवानों में डिप्रेशन वही का वही है। किसानों की आत्महत्या, कर्जबाजारी, पानी संकट और इंफ्रास्ट्रक्चर का पतन आदि से स्पष्ट है कि कुछ नहीं बदला है। वैसे भी विश्वास से ज्यादा अनुभव में है। सिर्फ एक पर्सेंट लोगों ने देश की कमाई व संसाधनों पर कब्जा कर रखा है। शेष 99% लोग इस एक पर्सेंट के जूते की नोक पर हैं। कुछ देश ऐसे हैं जहां प्रति व्यक्ति समृद्धि दर लागू है तो हमारे देश में क्यों लागू नहीं हो सकता ? एक मजदूर जो साल में 100 दिन रोजगार पाता है, उसका पारिश्रमिक 160 रूपया यानी उसे 16000 रूपये में पूरा साल चलाना होगा ? वहीं से दूसरी तरफ अमीर व्यक्ति एक दिन या एक हप्ते में 16000 रूपये का तो शराब पी जाते हैं। किसानों की आत्महत्या से लेकर महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार से पूरा देश त्रस्त है। दाने-दाने को लेकर आम आदमी परेशान हैं। लोग भूखे मर रहे हैं, और किसान आत्महत्या कर रहे हैं। लेकिन आम आदमी की वोटों से चुने गए सांसद व विधायक इन असहाय लोगों की आवाज उठाने की बजाय अपनी अपनी राजनीति चमकाने में लगे रहते हैं। बात करें इंफ्रास्ट्रक्चर व हाउसिंग सेक्टर की तो बुरा हाल है। नोटबंदी के बाद अब जीएसटी को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। आज कोई भी सामान खरीदो और दुकानदार से कीमत के बारे में सवाल पूछो तो झट से जीएसटी का नाम ले लेता है, जैसे हर किसी के लिए जीएसटी जिम्मेदार है। मतलब घर मंहगा, घर में रसोई मंहगी, पेट्रोल महंगा, दूध से दवा तक सब मंहगा अब तो इस तरह से अच्छे दिन नहीं आने वाले। बहस तो आम आदमी से जुड़ी समस्याओं पर होनी चाहिए थी, परन्तु ऐसा नहीं है। ऐसा लगता है कि संसदीय लोकतंत्र विफल हो गया है। भारत का लोकतंत्र बूढ़ा हो गया है, या यूं कहें बीमार चल रहा है। कोई दवा असर नहीं कर रही है और न ही कोई दुआ काम कर रही है। ऐसा लगता है जैसे कोई मरीज कोमा में पड़ा हो और उसके चलने फिरने की आस घर वालों ने छोड़ दी हो। मैं मानता हूं कि इस देश का आम आदमी भोला – भाला और सीधा – सादा है, किसी पर भी भरोसा कर लेता है, लेकिन 70 सालों के बाद भी अगर उसे भूखे पेट भजन करने को कहा जायेगा तो तय समझिए कि वह अपना आपा खो देगा।

– श्यामजी मिश्रा, बलसाड़

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