दतिया से जगदीश सुहाने का आलेख -■युद्ध में जीता कौन?■

■युद्ध में जीता कौन?■

युद्ध में जीता कौन?
महाभारत होने के बाद पाण्डव विजय का महोत्सव मना रहे थे।

इतने में दुर्योधन पीडित स्वर में चिल्लाया-जीता तो मैं हूँ।मेरे रहते आप लोग सुई की नोंक बराबर भूभाग नहीं पा सके।विजयोत्सव आप कैसे मना रहे हैं?

सारी जनता पाण्डवों को विजयी मान रही थी।लेकिन दुर्योधन का तर्क भी बजनदार था।

श्री कृष्ण वहीं खड़े थे।दोनों पक्षों ने उनसे “महाभारत युद्ध में जीता कौन है”-यह फैसला करने के लिए निवेदन किया।

श्री कृष्ण ने जो उत्तर दिया वह विलक्षण था।

उन्होंने कहा-जीता कौन है, यह तो नहीं कहा जा सकता।पर हारा कौन है, यह निर्विवाद रूप से तय है।

दोनों ने आग्रह किया कि वही बतला दें।कौन हारा?

श्री कृष्ण ने कहा-पारिवारिक मर्यादा (प्रतिष्ठा)हारी है।
द्रोपदी हारी है।

जो स्वयं को धर्मराज(धर्मरक्षक)कहते हैं उन्होंने उसे दॉव पर इसलिए लगाया कि हारी हुई सत्ता बचाई जा सके।
(युधिष्ठिर ने दॉव पर द्रोपदी को लगाया था, उसके बदले में यदि दॉव युधिष्ठिर जीत जावें तो पाण्डवों को उनका जुए में जीता हुआ राज्य(खाण्डवप्रस्थ)बदले में कौरव उन्हें बापस दे देंगे।यह शर्त थी।)

और दूसरे पक्ष ने भी सामाजिक मर्यादा का उसी बेशर्मी से उल्लंघन किया।वो तुम्हारी भावी थी, तुम्हारी मान्या थी।वो कुछ प्रश्न पूँछ रही थी तो उत्तर दे देते।कौन सा पहाड़ टूट रहा था।
(द्रोपदी का प्रश्न था कि युधिष्ठिर पहले स्वयं को हार गए थे इसके बाद क्या उन्हें मुझे दॉव पर लगाने का अधिकार था?)
लेकिन उत्तर देने के बदले तुमने उसे अपमानित किया।

तुम इस सामाजिक मर्यादा को जानते थे, पर तुमने भी ऐसा इसलिए किया क्योंकि तुम्हारी नीयत भी सत्ता(खाण्डवप्रस्थ)हड़पने की ही थी।

इसलिए द्रोपदी हारी है।
सामाजिक मर्यादा हारी है।

– जगदीश सुहाने , दतिया

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