दतिया से जगदीश सुहाने का लेख – प्रशंसा

🌷🌷🌷प्रशंसा🌷🌷🌷

प्रशंसा
ऐसी चीज जिसे सभी चाहते हैं।
ऐसी विश्वमोहिनी कन्या-जिससे विवाह की कामना में सभी नारदजी की तरह मोहित हैं।
हाँ,कुछ नए क्षेत्र उभरे हैं जिनमें प्रशंसा और निन्दा-दोनों समान फल देते हैं,वरन् निन्दा ज्यादा फलदायी है।
अपराध-क्षेत्र में अब अपराध करने पर न जाति से बहिष्कार का डर है न सामाजिक तिरस्कार का।इसके विपरीत समाज (भय या आतंक के कारण)सम्मान ज्यादा करने लगता है।
ऐसा ही राजनीति के क्षेत्र में भी देखा जाता है।निन्दा हो या तारीफ-नेता का आभामण्डल चमकता ही है, इस क्षेत्र में उपेक्षा भयावह है।आपराधिक मामलों में कह दिया जाता है-ये राजनीति से प्रेरित हैं।मेरी छवि बिगाड़ने की साजिश है।
अध्यात्म में दोनों ही महत्त्वहीन हैं।
फिर भी प्राथमिकता सभी लोगों की यही है कि प्रशंसा रूपी कन्या उसी का वरण करे।
पर ये प्रशंसा(स्तुति)रूपी कन्या आज तक अविवाहित है।
किसी को ये नापसन्द कर देती है कोई इसे पसन्द नहीं करता।इन्हीं हालातों के चलते यह आज तक अविवाहित है।
अद्यापि दुर्निवारं स्तुति-कन्या वहति कौमारम्।
सद्भ्यो न रोचते सा असद्भ्य:तस्यै न रोचन्ते।।
अर्थात् सज्जन उसे नहीं चाहते(उनके लिए”प्रतिष्ठा शूकरीविष्ठा”के समान है)और असज्जनों को वह रिजेक्ट(नापसंद)कर देती है।
इसीलिए संतों और सद्ग्रंथों ने स्तुति और निन्दा दोनों में समभाव रखने का उपदेश दिया है:-
निन्दा अस्तुति उभय सम—गोस्वामी तुलसीदास जी
तुल्य- निन्दा-स्तुतिर्मौनी—-श्रीमद्भगवद्गीता।आदि
वस्तुत:निन्दा और प्रशंसा की वास्तविक सत्ता ही नहीं है, ये दोनों प्रयोजन विशेष से कीं जातीं हैं ।
परन्तु व्यक्ति इन्हें सत्य मानकर अपना वैचारिक संतुलन भंग कर लेता है।
इस सम्बन्ध में ओशो(आचार्य रजनीश)ने एक सुन्दर कथा कही है:-
सर विंस्टल चर्चिल इंग्लैंड के प्रधानमंत्री थे।एक दिन उनका वहां की पार्लियामेंट में महत्वपूर्ण व्याख्यान था।
वे अपने बँगले से ठीक समय पर पार्लियामेंट जाने के लिए निकले।संयोग से बाहर एक ही टैक्सी खड़ी थी।उन्होंने उस टैक्सी वाले से पार्लियामेंट पहुंचाने के लिए कहा।वह उन्हें पहिचानता नहीं था-बाहर का रहा होगा।उसने जवाब दिया-अभी रेडियो पर चर्चिल महाशय का वक्तव्य आने वाला है।मैं उसे सुनने के लिए ही यहाँ(पास ही एक दुकान पर रेडियो था)खड़ा हूँ।वे बहुत महान हैं।मुझे उनका वक्तव्य सुनना है।अभी मैं नहीं चल सकता।चर्चिल को बड़ी प्रसन्नता हुई-एक गरीब व्यक्ति जो मुझे जानता भी नहीं, मेरे नाम पर मजदूरी छोड़ रहा है।फिर भी जाना जरूरी था, दूसरा बाहन तत्काल सुलभ नहीं था।इसलिए चर्चिल ने उसे दोगुनी कीमत देकर प्रस्तावित किया।उसनें तत्काल गेट खोलकर उन्हें बैठाया और गाड़ी स्टार्ट कर दी।
चर्चिल ने रास्ते में उससे पूँछा-अब वक्तव्य का क्या होगा?उसनें कहा-भाड़ मे जाए चर्चिल, मुझे अपने बच्चे पालना है।
कथा सत्य हो या न हो।कथ्य बिल्कुल सत्य है।जो यह दरसाता है कि प्रशंसा या निन्दा की वास्तविक सत्ता नहीं है, वरन् ये किन्हीं कारणों से की जाती हैं।कारण बदलते ही प्रशंसा परिवर्तित हो सकती है निन्दा में और निन्दा प्रशंसा में।
अस्तु जहाँ तक संभव हो हमें प्रशंसा और निन्दा से अविचलित रह कर अपने स्वरूप में स्थिर रहने का प्रयत्न करना ही श्रेयस्कर है।
– जगदीश सुहाने, दतिया

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