बैंगलोर से डॉ. ऋचा त्रिपाठी का आलेख – प्रयागराज का कुम्भ

प्रयागराज का कुम्भ

“ प्रकृष्ट: याग: इति प्रयाग: “ जहाँ प्रकृष्ट यज्ञ की धरा से सम्पूर्ण धरती गौरवान्वित अनुभव करती है वह देवभूमि धरा है प्रयागराज। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि —
“ गायन्ति देवा: किलगीतिकानि,
धन्या$स्तुते भारतभूमि भागे ।
स्वर्गापवर्गास्पद मार्ग भूते ,
भवन्ति भूय: पुरुष: सुरत्वात्।। “
अर्थात् देव भी जहाँ जन्म लेने हेतु लालायित रहा करते हैं किन्तु उनके भी भाग्य में यह दुर्लभ सौभाग्य नहीं होता। वैसे तो सच्चिदानंद परमात्मा कण-कण में व्याप्त रहते हैं किन्तु वह भक्तों के कल्याणार्थ शरीर धारण करने में भी उत्तर प्रदेश का ही चयन करते हैं। उदाहरणार्थ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र अयोध्या का तथा लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण मथुरा और वृंदावन का चयन करते हैं। भगवान श्रीराम की कथा का श्रवण एवं गायन भी महर्षि भरद्वाज के आग्रह पर महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रयाग में ही किया। प्रयाग की धरा ऋषियों – मुनियों, सन्त समाज, विद्वत् जनों और तपस्वियों की धरा रही है। यह त्रिवेणी नगरी दिव्य गंगा, यमुना और अदृश्य ज्ञानरूपी सरस्वती त्रिपथगा के प्रत्यक्ष संगम की साक्षी है।

श्रीराम चरित मानस में वर्णित है कि “माघ मकर गति रबि जब होई, तीरथपतिहिं आव सब कोई। “ सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही संक्रांति के बाद माघ पर्व का प्रारम्भ भी प्रतिवर्ष हो जाता है। प्रयागराज में कुम्भ का प्रारम्भ अमृत बूँदों के गिरने के बाद हुआ। कथा प्रसिद्ध है कि समुद्र मन्थन के अनन्तर भगवान धन्वन्तरि के अमृत कलश लेकर प्रकट होने तथा दैत्यों द्वारा उसे प्राप्त करने के निरर्थक प्रयास में अमृत कुम्भ से चार स्थलों पर अमृत की बूँदें गिर गई थीं जिनके नाम हरिद्वार ,प्रयाग, उज्जैन एवं नासिक हैं। इन स्थलों में लगने वाले कुम्भ पर्व में हम भगवान् धन्वन्तरि के अमृत कुम्भ के अमृत का अमृतपान करने का अनुभव करते हैं। कुम्भ के स्नान पर्व की उस अमृतमयी बेला में अब भी सब अमृत वर्षा सदृश आनन्द प्राप्त करते हैं तथा उस शुभ संयोग में मिलने वाले अनन्त पुण्य को प्राप्त किया करते हैं। इन चारों ही स्थलों पर प्रत्येक बारह वर्षों में कुम्भ के भव्य आयोजन का विशाल पर्व एक माह तक मनाया जाता है। प्रति छ: वर्षों में अर्द्ध कुम्भ का आयोजन होता है।

इस बार प्रयागराज में अर्द्ध कुम्भ का ही आयोजन है किन्तु इसके विशद् स्वरूप से कुम्भ की प्रतिध्वनि हो रही है। सर्वत्र हर- हर गंगे, गंगा मैया की जय, बाँसुरी की ध्वनियाँ तथा विविध पाण्डालों में होने वाले आध्यात्मिक आयोजनों एवं प्रवचनों से एक दिव्य सकारात्मक ऊर्जा की एक विशिष्ट सृष्टि का अनुभव इस प्रयागराज तीर्थ मेला क्षेत्र में होता है। गंगा स्नान अथवा संगम स्नान के अनन्तर अक्षयवट दर्शन तथा लेटे वाले हनुमान जी के दर्शन से मानो यह पुण्य और अनेक गुना बढ़ जाता है। कुम्भ पर्व के मास पर्यन्त स्नानों में पौष पूर्णिमा, अमावस्या, वसन्त पंचमी, अचला सप्तमी एवं माघ पूर्णिमा प्रमुख हैं किन्तु अमृत कुम्भ से अमृत वर्षा का मुहूर्त अमावस्या स्नान के समय का होता है।

यहाँ करोड़ों- करोड़ श्रद्धालु गंगा यमुना और संगम में स्नान कर अपने तन को पवित्र कर पुण्य के भागी होते हैं तथा विविध साधु सन्यासियो द्वारा दिए गए प्रवचन से अपने मन को स्वच्छ कर आत्म साक्षात्कार के अनुगामी होते हैं। अक्षयवट, वेणी माधव मन्दिर, हनुमान जी, मनकामेश्वर भगवान, समुद्र कूप, ललिता देवी, कल्याणी देवी, अलोपिन मैया सब हमारी प्रयाग नगरी को युगों- युगों से आशीष दे रहे हैं। प्रयागराज को तो जगत् का कारण पिता भी कहा गया है। उनसे स्वमनोकामना पूर्ति हेतु प्रार्थना की गयी है कि —
“ त्वं राजा सर्व तीर्थानां त्वमेव जगत: पिता ।
याचितं देहि मे तीर्थं तीर्थराज नमो$स्तुते ।। “

– डॉ. ऋचा त्रिपाठी
कर्नाटक, वेंगलूरु

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