बेंगलुरू से डॉ. ऋचा त्रिपाठी का लेख – गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस

आज हम गणतंत्र दिवस के हर्षोल्लास पूर्ण वातावरण में यह उत्सव मनाने रहे हैं। आज इस पर्व पर हम सबको अपने स्वतंत्रता सेनानियों और असंख्य शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाहिए जिनके आत्मोत्सर्ग के परिणामस्वरूप ही हम इतने वर्षों की गुलामी से मुक्ति पाकर स्वतंत्र हो सके। हमें सुभाष चंद्र बोस एवं भगत सिंह इत्यादि क्रांतिकारियों को विस्मृत नहीं करना चाहिए जिनके पराक्रम और वीरता के कारण ही द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेज भयाक्रांत हुए और उन्हें हमें स्वतंत्र करने का निर्णय करना पड़ा। उन्होंने भारत का विभाजन करते हुए विश्व पटल पर भारत एवं पाकिस्तान दो भागों के रूप में हमें स्वतंत्र कर दिया। तत्कालीन परिस्थितियों में गान्धी एवं नेहरू जी को ही स्वतंत्रता प्राप्ति का श्रेय दिया गया किन्तु शायद आज तक हम उनकी कुछ गलतियों के परिणामों को झेल रहे हैं।

आज हम गणतंत्र दिवस का 70 वां उत्सव मना रहे हैं। गण का आशय है व्यक्ति अथवा जनता। तंत्र का अभिप्राय है शासन। अस्तु गणतंत्र का अर्थ हुआ जनता का शासन। दो वर्ष, ग्यारह महीनेऔर अट्ठारह दिन के अथक परिश्रम के उपरांत हमारा संविधान बनकर तैयार हुआ। आज 26 जनवरी के ही दिन 1950 में हमारा संविधान हमारे देश में लागू हुआ था। संविधान सभा के द्वारा संविधान निर्माण के लिए एक कमेटी का गठन किया गया। जिसके प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ० भीमराव रामजी अम्बेडकर थे जिन्होंने विभिन्न देशों के संविधानों का अध्ययन कर उनकी अच्छी तथा हितकर बातों को मिलाकर अपने देश का संविधान बनाया। लोकतंत्र के विषय में कहा जाता है कि “of the people, by the people and for the people. “अर्थात् जनता के लिए, जनता द्वारा जनता का शासन ही लोकतंत्र का आधार है, किन्तु मेरे मत में जनतंत्र हेतु योग्य तथा बुद्धिमान और जिम्मेदार लोग ही एक स्वस्थ और स्वच्छ लोकतंत्र के आधार में उपयोगी हैं। यहाँ एक राष्ट्रपति एवं सामान्य मजदूर दोनों के मत का मूल्य समान है। अस्तु एक वास्तविक रूप से शिक्षित और अच्छी मन: स्थिति के उदात्त चरित्र वाले व्यक्तियों का समूह ही एक मजबूत लोकतंत्र के निर्माता हो सकते हैं। अपने उत्तर दायित्वों का निर्वहन करने से ही लोकतंत्र में सबका सम्भव है। सारी व्यवस्थाओं की सुचारु प्रणाली हेतु शासन की प्रतीक्षा करनी उचित नहीं है वरन् अपने स्तर से और थोड़ा प्रयत्नपूर्वक व्यवस्थाओं को ठीक करना हमारा भी दायित्व है।

मेरा अगला बिन्दु हमारे सूरक्षा बल एवं हमारी सेनाएँ हैं जिनके विकास एवं सुरक्षा हेतु हमें अपना रक्षा बजट सुधारना होगा तथा प्रत्येक स्थिति में उनका मनोबल बढ़ाते हुए उनका पूर्ण सहयोग करना होगा। हमें यह नहीं विस्मृत करना चाहिए कि किन विषम परिस्थितियों और मन:स्थितियों में रहकर वह हमारी तथा हमारे देश की रक्षा अपना प्राणोत्सर्ग करके भी करते हैं इसलिए केवल आतंकवादियों एवं तथाकथित छात्रों के मानवाधिकारों की चिन्ता किए बिना हमें अपने सैनिक के मानवाधिकारों को सुनिश्चित करना चाहिए। हमें उनक़ा सम्मान तथा उनके परिवारों की सहायता मन, वचन कर्म से करनी चाहिए। किसी भी स्थिति में उनका तिरस्कार एवं उनका अपमान सहनीय नहीं है। 26-11के हमले में हमारे सैनिक एवं अफसरों का मारा जाना सिर्फ उनकी नियति नहीं थी वरन् बुलेटप्रूफ जैकेट्स का अभाव था, आज परिस्थितियों में थोड़ा सुधार तो है किन्तु मिग विमानों के प्रयोग द्वारा उनकी अन्त्येष्टि अनुचित भी है और असहनीय भी। लेह, लद्दाख, सियाचिन, पूरा पाकिस्तान व चीन के सीमावर्ती क्षेत्रों में तकनीक का विकास कर विजय हासिल करनी चाहिए न कि अपने बहादुर सैनिकों के प्रति दिन के बलिदान को नमन कर चुपचाप स्वीकृति देनी चाहिए।

हमारे वैज्ञानिकों द्वारा किए गए प्रक्षेपणों एवं मंगलयान तथा अन्तरिक्ष स्वच्छता अभियान की कामयाबी से मैं नतमस्तक और उनकी आभारी हूँ जिनके अथक परिश्रम से भारत अपना परचम लहरा रहा है। मैं उनसे एक विशेष आग्रह करना चाहती हूँ कि कृपया वे हमारे सैनिकों की और हमारी सरहदों की सुरक्षा के प्रति थोड़ा ध्यान आकृष्ट करें और कुछ ऐसी खोजें करे जो सर्वप्रथम हमारे देश की सीमा की सुरक्षा को और सुदृढ़ करने में भी योगदान दे सकें।

अंग्रेजों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था में भी सेंध लगाई ,गुरुकुलों की शिक्षा व्यवस्था को समाप्त कर मैकाले की शिक्षा व्यवस्था को स्थापित कर दिया जिसका परिणाम आज की पीढ़ी के रूप में परिलक्षित होता है जिसमें सत्य, अहिंसा, नैतिकता, प्रेम त्याग धैर्य, चरित्र निर्माण, दया, सहानुभूति इत्यादि के गुणों का पूर्ण अभाव मिलता है। हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था में थोड़ा सुधार करके देशभक्ति, नैतिकता उज्जवल चरित्र निर्माण हेतु प्रयास करना चाहिए। यदि सरकार और कोर्ट के गलत आदेशों द्वारा बच्चों में राष्ट्र गान के समय खड़े होने और राष्ट्रगीत गाने का भाव न होना हमारी शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। ऐसे बच्चों के बड़े होने पर उनमें देशप्रेम के भाव का नितान्त अभाव मिलेगा जिससे जयचंदो की टोली बनने में देर न लगेगी और हम विकास का राग ही अलापते रह जाएंगे।
हमारा समाज तत्कालीन समय एवं परिस्थितियों में जिस प्रकार विभक्त था कमोबेश कुछ रूप परिवर्तन के साथ वह आज भी विभक्त है। आज हम सामाजिक ढांचे में तो उतना विभक्त नहीं हैं किन्तु मनसा यह विभाजन और इससे उत्पन्न द्वेषभाव परिलक्षित होता है व्यवस्थानुकूल यह कुछ उचित भी है जैसे एक जिले के सभी नागरिक डीएम नहीं हो सकते एक ही के पास प्रभार होता है किन्तु हमारे मनोभावों को ठेस पहुंँचा कर अत्याचार अवश्य शोषण की श्रेणी में आता है। हमारा दायित्व यह है कि हम अपने कार्यों को कुशलतापूर्वक, नैतिकतापूर्ण दायित्व निर्वहन के साथ सम्पन्न करें।

अत एव हमें राजनीतिज्ञों के स्वार्थ
परक छलावे में न आकर बुद्धिमत्ता तथा राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए निर्णय करने चाहिए। हमें पाश्चात्य के प्रभाव तथा आधुनिकीकरण में अपनी संस्कृति को विस्मृत नहीं करना चाहिए और अपने ही हाथों अपने पतन को नहीं आमन्त्रित करना चाहिए। हम सबको यह मिलकर संकल्प लेना चाहिए कि सबमें देशप्रेम का भाव उत्पन्न हो तथा देशहित ही हमारी प्रथम वरीयता हो ।
जय हिंद, जय भारत
डॉ०ऋचा त्रिपाठी
बैंगलोर, कर्नाटक

Please follow and like us:
0

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*