मुम्बई से अंजलि व्यास की कविता – घर

घर

हर एक ईट की नींव खून -पसीने की मेहनत हो
अपने बच्चे को बढ़ते देख जो आनंद मिले वैसी ही अनुभति
जिसे बनते देखो हो वो घर …

जहाँ की दरो -दीवारें भी अपनी सी लगे
जिसे हाथों से अपने सजाने का हर एहसास ही अलग हो
एक – एक जर्रे में हो अपनापन
जहाँ पत्थर की मूरत नहीं इंसान की इंसानियत बसती हो
वही तो है घर …

माँ की ममता पिता का प्यार
दादी का दुलार , नानी की अनगिनत कहानियाँ
भाई – बहनों से बे -सर पैर की रोज की बहस
रूठना -मनाना और फिर से एक हो जाना
बचपन के बिताएं बेबाकी पल
बच्चों के जन्म , नामकरण , शादी , अपनों की
सालगिरह , वर्षगाँठ न जाने कितने अवसर बेशुमार
जिसकी गोद में हो समाये
है यही प्यारा सा घर ..

रिश्तों की खट्टी – मीठी तकरार
और तकरार में बसा प्यार -विश्वास
सौगात हो सदा ही साथ
ईंट- पत्थरों से बना किराये का मकान हो
चाहे रईसी इमारतों का ठाट – बाठ
जा परायापन हर पल प्रतीत होता
वो कहा घर कहलाता ?
दुनिया घूम आने पर भी
जहाँ आकर चैनो -सुकून मिलता
वही तो घर कहलाता

कभी महसूस होता जैसे
कही सीमेंट में मिलावट होती
ऐसी ही तो रिश्तों में भी झूंठ , बेईमानी
और धोखे की मिलावट होती
फिर भी यही विश्वास
एक दिन बनेगा सबका ही
एक प्यारा सा घर
अपना सा न्यारा हर एक घर
ईर्ष्या , जलन , द्वेष , विकार
भेदभाव हो या निर्दोष को अन्याय
सब होंगे समाप्त
और बनेगा प्यारा -सा एक आशियाँ
वही घर ……

मौलिक एवं स्वरचित
अंजलि व्यास
मुंबई

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