सम्पादकीय में पढ़िए – स्वतंत्रता का संयमित होना जरूरी

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में स्वतंन्त्रता : संयमित होना जरूरी

स्वतंन्त्रता के परिप्रेक्ष्य में जब भी बात उठती है -सबसे पहले हमारे जेहन में देश की आज़ादी का ख्याल आता है। स्वाभाविक भी है यह । मुगल सल्तनत और अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने में हमारे शहीदों की शहादत प्रणम्य है । उन्हें याद करना , नई पीढ़ी को क्रूर इतिहास से अवगत कराना और देश हित में प्रेरणा लेना भी स्वतंत्र भारत की अनिवार्यता होना चाहिये , पर मुझे लगता है अब यह मात्र दिखावा बन कर रहा गया है।
भारत को गुलामी के जीवन और उन यातनाओं से आजाद हुए बहत्तर वर्ष हो गए हैं । उन दशकों में जन्मी अधिकांश आबादी भी अब मौजूद नही है। परिस्थितियां बदली है , हमारे सोचने – समझने का दायरा भी बदला है और इसके साथ ही हमारी जवाबदेही भी बदली है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में स्वतंन्त्रता के मायने मुझे बदले हुए नजर आते हैं । आज स्वतंन्त्रता की सर्वाधिक चर्चा – स्त्री स्वतंन्त्रता को लेकर होती नजर आती है। स्वतंन्त्रता के नाम पर एक वर्ग की अकुलाहट / विमर्श ने सम्पूर्ण व्यवस्था को ध्वस्त कर रखा है।
कह सकता हूँ कि हम फिर एक नई गुलामी के युग में प्रवेश करते जा रहे हैं । साफ सा आशय यह है कि जिस देश में नारी को देवी का महत्व दिया जाता हो , उनके विविध स्वरूप की पूजा – अर्चना की जाती हो , वह आज बराबरी का दर्जा पाने को व्याकुल है । क्या यह खुद के महत्व को कम करने वाली बात नही है ? ऐसी स्वतंन्त्रता किस काम की जो मुख्य दायित्व से विमुख कर दे ? माना बहुत बड़ा तबका आज भी शोषित है , पर क्या वह सीमित दायरे में सुरक्षित नही है ? स्वतंत्रता की आड़ में कितनी महिलाओं का आज भी शोषण होता है !
स्वतंत्रता जब स्वच्छन्दता की ओर बढ़ने लगती है तो फिर उसके परिणाम किसी न किसी की गुलामी पर ही आकर टिकते हैं , यह सार्वभौम सत्य है। अलावा इसके एक महिला को यदि आवश्यकता न होने पर भी परिवार से नाउकरी करने की आजादी मिलती है तो क्या वह दो – चार महिलाओं को अपने घर में काम वाली बाई के रूप में रखकर अपना गुलाम नही बनाती ? क्या स्वतंन्त्रता समान रूप से सबको हासिल हो सकती है ? कहीं न कहीं कोई न कोई तो गुलामी करने को विवश होगा ही । यहां यह तर्क दिया जा सकता है – कि उन्हें भी पैसों की जरूरत है । हम तो उपकार ही कर रहे , पर क्या यह समान स्वतंन्त्रता का रूप हो सकता है ?
खैर ! स्वतंन्त्रता के बदले अर्थों से न जाने कितने परिवार तबाह हुए हैं – चाहे लिव इन रिलेशन हो , एकाकी जीवन हो या घर के सदस्यों में बिखराव हो । बच्चों का लालन – पालन आया (गुलाम) के भरोसे हो या बुजुर्ग वृद्धाश्रम में रहें – जरूरी है हमारी स्वतंन्त्रता !
अब आएं – अभिव्यक्ति की स्वतंन्त्रता पर । सबको मिली है यह पर इसका जितना दुरूपयोग स्वतंत्र भारत में हो रहा है , उतना कभी नही हुआ । संयम के बांध टूट रहे हैं । जिसके मन में जो आ रहा है , वह व्यक्त कर रहा है । परिणाम की कोई चिंता नही ।
क्या यही वास्तविक स्वतंन्त्रता है ?
क्षेत्र चाहे कोई हो , आर्थिक, सामाजिक , पारिवारिक या व्यावसायिक , स्वतंन्त्रता को संयमित करना ही होगा , क्योंकि इसकी परिणति अंततः बहकती हुई बर्बादी में ही होती है।
– देवेंन्द्र सोनी

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