देवास से कविता नागर की लघुकथा -मन के गीत

मन के गीत..

सुधांशु जी मेहता अपने लेखों और भावपूर्ण रचनाओं के लिए मशहूर थे,आज उन्होंने एक छोटी सी साहित्यिक सभा का आयोजन किया था..जहाँ सभी छोटे मगर प्रतिभाशाली साहित्यकार मौजूद थे,प्रोत्साहन व मार्गदर्शन भी मिले,आपसी विचार विमर्श हो।इसी उद्देश्य के लिए ये आयोजन किया गया था।

अपने ही शहर के एक प्रसिद्ध साहित्यकार कृपाशंकर सहाय को सुंधाशु जी आमंत्रित कर आए थे,हालांकि उनके आने की संभावना कम थी,कितने ही साहित्यिक पुरस्कार उनके नाम थे।कितने ही गीत लिखे थे,उन्होंने जो कि लोगों की जुबान पर चढ़े हुए थे।सब उनका बहुत आदर करते थे।बडे़ ही सम्मानीय व्यक्ति थे।

साहित्यिक चर्चा चल ही रही थी,सब अपनी अपनी रचनाएं सुना रहे थे,कि तभी अचानक ज्यौं मंदिर की घंटी की टंकार से बाकी ध्वनियां गौण हो जाती है,एक गरिमामय मौन छा गया।सबने देखा कि सादा वेशभूषा में कृपाशंकर जी पधार रहे थे।
अरे आप सब शांत क्यों हो गए, चलने दीजिए,चर्चाएं।वे बोले।

अब तो सभी लोगों ने उन्हें घेर लिया,व वार्तालाप आरंभ हो गया,हम धन्य हुए आदरणीय आपका आशीर्वाद हमें मिल जाए,सभी कहने लगे।

आपकी रचनाएं,कितनी भावपूर्ण और सुंदर होती है।देशभक्ति के गीत तो जुबां पर चढ़ जाते है।आपके लेख हमें आंदोलित कर जाते है।ये रचनाएं हमारें ह्दय में भाव जगाकर अंतस को गुंजायमान कर देती है..ये गीत हमारे मन के आंगन में बज उठते है।

इस पर कृपाशंकर जी बोलें,मैं भी यही चाहता हूंँ, जो लिखूं,वो मन में गूंजता रहे,तभी लेखन सार्थक हो पाएगा, हाँ मैं ऐसे गीतों का विक्रेता हूंँ, जो मन में गुंजायमान हो और आप जैसे लोगों की वाहवाही इसे खरीद लेती है।

आप लोगों से भी यही आशा है,जो भी लिखें,संदेशयुक्त लिखें,व लेखन से समाज को सही
दिशा भी दे..आप सभी का आभारी हूँ।और पीढियों तक ये रहूंगा ।
-कविता नागर..
देवास(म.प्र.)

Please follow and like us:
0

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*