Devendra Soni August 13, 2018

नई कविता –
मेरी डायरी

कई अनकही बातें थी महफ़ूज़
मेरी उस डायरी में
कैद थी शिकायते बचपन की
छोटी बड़ी शरारतें
सहेलियों से लड़ने के बाद
दी हुई वह मासूम गालियाँ
बदद्दुआयें भी….!!
पर वह बद्द दुआएं असर
नही करती थी
क्योंकि उसके कोई
मायने नही होते थे
खुब हँसी में उन्हें पढ़कर
शायद दिल से…..
आज उन सारे मासूम
मायनो को सिरें से
नम आँखों से
अलविदा कह दिया…..!!!

कैद थी अल्हड़ फरेब से परे
की किशोरावस्था
पहला चेहरा पहली दोस्ती
पहली माँ की अज़ीब सी डाँट
पापा का त्तमतमाता चेहरा
गली की नुक्कड़
वह छेड़छाड़
और दिल का अज़ीब सा धड़कना
साइकिल की घँटी
और वह प्यारा सा चेहरा
उस घँटी को भी नम आँखो से
अलविदा कह दिया आज…..!!

वहपहली बारिश की खुद पर छुवन
माँ का वह हड़बड़ी में मुझे समेटना
माँ के माथे पर वह चिंता की सिलवटें
शायद बेटी बड़ी हो रही की फ़िक्र
वह सिलवट को भीं नम आँखों से
अलविदा कह दिया आज….!!
इन सब लिखे जज़्बातों को अब
समझने लगी थी मै
तभी जन्म लिया था एक डर ने मुझमें
स्त्री होने का डर
बन्दिशों का डर
रोक टोक के प्रश्न
तुलनात्मक्ता का आक्रोश
पनपने लगता था मुझमें
बस वह कैद था जिसमें आज नम आँखों से
अलविदा कह दिया आज….!!
– स्वरा..सुरेखा अग्रवाल
लखनऊ यूपी

1 thought on “लखनऊ से सुरेखा अग्रवाल की नई कविता – मेरी डायरी

Leave a comment.

Your email address will not be published. Required fields are marked*