Devendra Soni August 13, 2018

शिव और कृष्ण

सावन के माह में कृष्ण और शिवजी दोनों देवों की भक्ति से भक्तों के मन सराबोर होने लगता है। भगवान शिव देवाधिदेव है तो कृष्ण प्रेमधिपति है।

वैसे भी भगवान कृष्ण की नगरी द्वारिका जो गुजरात में स्थित है। इसी लिए गुजरात में शिवजी के साथ साथ कृष्ण भक्ति भी पुरबहार खिली हुई है।

कभी कभी भक्तों में इस बात पर बहस भी होती रहती है कि दोनों देवों में कौन श्रेष्ठ। मगर मेरी इस संदर्भ में जो मान्यता है इसे मैं आप सब के साथ साझा करना चाहूँगी।

मेरा मानना है कि कृष्ण और शिव अलग है ही नहीं। न कहीं पर कैलास है न वैकुंठ। जो भी है हमारे भीतर ही तो है। हमारा हृदय स्थान में अगर परम् प्रेम उद्घाटित हो जाय तो वहीं पर है वैकुंठ। उस वक्त जिस परम प्रेम की अनुभूति होती है वही तो है कृष्ण। कृष्ण माने हमारे अंदर का वो व्यक्तित्व जो परम् प्रेमरूप है। जो सब को प्रेम और करुणा से अपनाकर उसका कल्याण करता है।

शिव का अर्थ भी तो कल्याण ही होता है। मगर शिव हमारी चेतना की वो अवस्था है जो पूर्ण वैराग्य और परम्आनंद की अवस्था है। मुझे कुछ नहीं चाहिए की मनोदशा में अगर परम् आनंद की अनुभूति हो रही हो तो वहीं है कैलास जहाँ आप अपने शिवजी से ही तो मिल रहे हो।

यहाँ एक बात आप के मन में ये भी आ सकती है की क्या कृष्ण वैरागी नहीं है? या फिर शिव प्रेममय नहीं है?

मैं तो यही मानती हूँ कि कृष्ण से बड़ा वैरागी शायद ही जगत में कोई दूसरा हॉगा। जन्म के साथ जन्मदात्री से अलग होना। जन्म भी कहाँ ?एक काल कोटरी में। राजा के पुत्र होने के बावजूद गोप बाल बनकर पलना। अपनी प्रियतमा से ऐसा विछोह की एक बार छूटे फिर जीवनभर न मिले। शिशुपाल की गालियां सुनकर भी शांत रहना। अपने अधिकार के लिए नहीं मगर लोकहित के लिए अपने ही मामा का वध कर के सब कुछ त्याग कर वहाँ से निकल जाना। अपने ही बलबूते पर द्वारिका बसाना..कितना कुछ ..

फिर भी जीवन में न कभी थके न कभी हारे। सदैव मुस्कुराते हुए ही मिले। अपना दर्द अपने में समायें विश्व कल्याण के लिए कुरुक्षेत्र जैसे स्थान पर भी गीता का उपदेश देने वाले कृष्ण मेरी दृष्टि से परम् योगी ही तों थे। परम वैरागी ही तो थे।

दूसरी ओर देखें तो भगवान शिव समशान की भस्म को लपेटे, अंग पर भुजंग का शृंगार कर के अहर्निश ध्यान की मस्ती में डूबे हुए मिले है।
फिर भी प्रेममय तो है ही तभी तो सती के मृत शरीर को उठाकर तांडव करने वाले जटाजूट जोगी जो देवी पार्वती के तप से प्रसन्न होकर उनसे शादी रचाने के लिए हिमालय और मेनका के दामाद भी बने।

इन दोनों महाग्रंथों में दर्शाये विवरण को अगर हम मान भी ले तो इसमें हर्ज़ क्या है? श्रीमद्भागवत हो या शिव पुराण सारतत्त्व तो एक ही है।
जीवन में भी कोई भी परिस्थिति में समता को बनाएं रखना।

भगवान कृष्ण के श्रृंगार की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। भक्तों के प्रेम के आगे वो घुटनों के बल दौड़ते गोपाल भी है। गोपी मन रंजन रासोत्सव विहारी रसज्ञ भी है। दूसरी ओर भगवान शिव का श्रृंगार भी तो गज़ब है। जिसे कोई न चाहे उन सर्पों को गले में धारण किये चंद्र को जटा में बिठाए हुए है। जिस की गणना फूलों में होती ही नहीं ऐसे केवड़े और धतूरे को अपनी पूजा में अपनाकर सृष्टि के हर सर्जन को उत्कृष्ट बताकर स्वीकार करते है।

मुझे लगता है की दोनों देवों के जीवन से हमें यही सीखना है कि चाहे मिसरी मिले या धतूरा मस्त रहो। कदम्ब मिले या केवड़ा खुश रहो। महलों में रहो या शमशान में समत्व बनाएं रखो।

लोगों का स्वीकार मिले या अवहेलना शांत रहो। पूर्ण प्रेम पाकर भी वैराग्य को बनाये रखो और वैरागी होकर भी पूर्ण प्रेममय रहो।

तभी तो मुझे लगता है की जब शिव प्रेममय होते है वही तो कृष्ण है और जब कृष्ण ध्यानस्थ होते है तो वही शिव है।

दोनों अलग नहीं है एक ही चैतन्य की दो विभावनाएँ है।

– भावना भट्ट , भवा नगर, गुजरात।

12 thoughts on “विविध में पढ़िए गुजरात से भावना भट्ट का लेख – एक ही हैं शिव और कृष्ण

  1. धन्यवाद देवेंद्रभाई धन्यवाद युवा प्रवर्तक

  2. क्या ख़ूबसूरती से आपने प्रेम और वैराग्य को परिभाषित किया है ।। आपका ये सन्देश निश्चय ही सभी के लिए प्रेरणादायी रहेगा ,आपको शुभकामनाएं।।
    डा. जितेन्द्र ।।O

  3. Superb article. Gives a very perfect understanding of lord krishna and Shiva. Also gives a real meaning of life.

  4. बेहतरीन लेख लिखा है,,,,,आपने,,,नमन ,,,??????

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