Devendra Soni August 13, 2018

वर्षा रानी

रस की बहार जब यह वर्षा बरसे ,,
खग मृग संग मनु हृदय भी हरसे ,,
जड़ चैतन्य भी सब होते पुलकित,,
धरा वनस्पति भी मुदित हैं तबसे ,,

अाक्छादित भूमि पर इसका यौवन,,
ऋतु वर्षा की गाती रिमझिम ध्वनि ,,
अभिनव मनमोहक श्रृंगार है करती,,
अनुपम सौंदर्य की देवी यह अवनी ,,

व्याकुल से मन को यह धीर धराए ,,
पिया मिलन की यह आस जगाए ,,
भड़की ज्वाला जो बिरहा मन की ,,
प्रियतम की चाहत का बोध कराए,,

हर बूंद में छिपा है इसके नवजीवन ,,
सरिता वृक्ष पर्वत निज स्नेही स्वजन,,
ह्रदय में उमंग का यह करती संचार ,,
वर्षाऋतु है स्वयं वसुंधरा का आधार,,

– दर्जा सिलगीवाला

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