Devendra Soni August 13, 2018

स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ: आज और कल के परिप्रेक्ष्य में
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जब हम स्वतंत्रता की बात करते हैं तो यह स्वतंत्रता सार्वभौम होती है। किसी एक देश, एक जाति, एक धर्म या एक व्यक्ति मात्र के लिये नहीं बल्कि पिंजरे में बंद हर जीव-जन्तुके लिये भी स्वतंत्रता आवश्यक है। स्वतंत्रता सार्वभौम होती है तो उसकी एक सीमा भी आ जाती है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार…जैसा मैं स्वयं के साथ नहीं चाहता वैसा मुझे दूसरों के साथ करने का भी अधिकार नहीं होगा….तो ऐसा है।
मानव की स्वतंत्रता पर मानव ही सीमायें लगाता है। यदि प्रत्येक मानव निजी स्वार्थ छोड़ कर सार्वभौम या सम्पूर्ण मानव समाज के उत्थान का विचार मन में रखते हुए अपने कार्य करता है तो निस्सन्देह वह आज और कल दोनों के लिये स्वतंत्रता की रक्षा करने वाले एक सैनिक और योद्धा की भूमिका निभाता है।
आज मनुष्य को राजनैतिक स्वतंत्रता तो मिली है मगर वह संविधान के पृष्ठों तक सीमित है। वोट दिया, अपने अधिकार दूसरों को सौंपे और पुनः परतंत्र हो गये। नौकरशाही, भ्रष्टाचार, जातिवाद, सांप्रदायिकता, कुटिल राजनीति, नासमझी, मूढ़ता, अशिक्षा, धर्म के नाम पर पाखंड आदि ये सभी कारक मानव मात्र की स्वतंत्रता को बाधित ही करते हैं। इनसे मनुष्य की रक्षा करने वाले कारक प्रेस-मीडिया, जागरूक समाज सेवी कार्यकर्ता, समाज एवं राष्ट्रहित चाहने वाले नागरिक, आध्यात्मिक सोच, लेखक-कवि, समाज कल्याण में लगी संस्थाएँ और स्वस्थ पारिवारिक परिवेश तथा जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानव की स्वतंत्रता की सुरक्षा का प्रयास करते हुए दिखाई देते हैं, पर कभी-कभी इन प्रयासों में भी मिलावट देखने में आती है और संविधान तथा कानून द्वारा दी गयी स्वतंत्रता मृगमरीचिका की भाँति प्रतीत होती है।
हम कह सकते हैं कि आज की स्वतंत्रता सैद्धांतिक अधिक और व्यावहारिक बहुत कम है। आम आदमी अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग करता भी है तो एक भ्रष्ट हटता है और दूसरा भ्रष्ट आ जाता है। चौकीदार ही चोरी की योजनायें बनाता है। आम आदमी पुनः स्वतंत्रता से वंचित हो जाता है।
इतना सब होते हुए भी अगर भूतकाल की तुलना हम वर्तमान से करें तो पायेंगे कि मनुष्य की स्वतंत्रता में काफी वृद्धि हुई है। परतंत्रता और सामंती युग की तुलना में तो स्वतंत्रता और समानता का अनुभव होता है। यह आशा कर सकते है कि मानव समाज स्वतंत्रता की ओर अग्रसर हो रहा है। आज से सौ वर्ष पहले भ्रष्टाचार नौकरशाहों का अधिकार जैसा होता था, उसके लिये सजा दिलवाना लगभग असंभव होता था। जात-पात, छुआ-छूत, ऊँच-नीच को सामाजिक और किसी हद तक कानूनी मान्यता भी प्राप्त थी। राजनैतिक स्वतंत्रता तो खैर थी ही नहीं। आज परिस्थितियाँ अनुकूलता की ओर अग्रसर हैं।
आज की बढ़ती हुई जागरूकता और विकसित होती हुई तकनीकें निस्सन्देह आज के मानव की तुलना में कल के मानव को अधिक स्वतंत्र बनायेंगीं। आज संसद, न्यायपालिका और प्रेस आदि ने व्यवस्था को सही रास्ते पर चलने के लिये विवश करना प्रारंभ कर दिया है। सामाजिक समरसता बढ़ रही है, साक्षरों और शिक्षितों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है। मानव स्वयं की स्वतंत्रता के साथ-साथ दूसरों की स्वतंत्रता के महत्व को समझने लगा है। अंतर्जाल ( इंटर्नेट ) के माध्यम से चलने वाले फेसबुक, व्हाटसप, मैसेंजर, ट्विटर (twitter), ब्लॉग, यू ट्यूब , गूगल आदि ने सूचना, अभिव्यक्ति एवं वैचारिक स्वतंत्रता के क्षेत्र में क्रांति का शंखनाद कर दिया है। ७०-८० के दशक में शिक्षाशास्त्री ज्ञान के प्रसार को अंग्रेजी भाषा में “ विस्फोट ऑफ नॉलेज “ कह कर पुकारते थे, जिसका अर्थ बहुत अधिक संख्या में लोगों के शिक्षित होने से था। कहना न होगा वह विस्फोट ऑफ नॉलेज अब हो चुका है और अब अपने प्रभाव दिखा रहा है।
ऑनलाइन प्राथमिकी , सभी क्षेत्रों-विभागों में संगणक का उपयोग, अधिकांश लोगों का बैंक खाता मनमानी और भ्रष्टाचार को रोकने में सहायक हो रहा है। यही कल स्वतंत्रता के और नये आयाम विकसित करेगा।
हाल ही में प्रारंभ हुई अंतर्जाल आधारित क्रिप्टो करेंसी, जो बिटकॉइन के रूप में सामने आई है तथा ब्लॉकचैन तकनीक, जो दस्तावेजों की हेराफेरी को असंभव बना देती है, का प्रयोग कल के मानव को बैंकिंग और नौकरशाहों की मनमानी से पूर्णतः स्वतंत्र करायेगी। निस्संदेह आज की तुलना में कल अधिक स्वतंत्र होगा।
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डा० भारती वर्मा बौड़ाई , देहरादून

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