Devendra Soni August 13, 2018

नई कविता –
चिरैया

आओ कि हटा दूँ ..
ये आवरण जो
तुमने ओढ़ रखें हैं..
नाम पर ,
नक़ाब के,
हिज़ाब के,
घूंघट के,
मर्यादा के,
अभिव्यक्ति पर
दबाव के..!

मैने देखा है हमेशा
एक पर्दा,
एक नक़ाब,
एक घूंघट ,
एक मर्यादा ,
तुम्हारी आँखों में ….!
शर्म के,
लाज के,
हया के रूप में…
वही है सच्चा आवरण,
असली पर्दा,
जो होता है आंखों में
स्त्री की ही नहीं
मर्द की भी…!

आओ की खिला दूँ,
तुम्हारे होठों पर..
उन्मुक्त हँसी,
अल्हड़ हँसी,
मुस्कुराहट ,
जो पूर्ण खिली,
कह सको तुम
सही को सही
गलत को गलत
आओ कि तुम्हे
बना दूँ मैं ..
उन्मुक्त आकाश की
स्वतन्त्र चिरैया …!!

– हेमंत बोर्डिया , खरगोन

1 thought on “खरगोन से हेमंत बोर्डिया की कविता – चिरैया

  1. रचना के प्रकाशन के लिये और नव साहित्यकारों के प्रवर्तक के रूप में इस पहल के लिए बहुत बहुत धन्यवाद,शुभकामनाएं ।

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