Devendra Soni May 23, 2020

    और नहीं बस और नहीं ….

देश की आज़ादी के बाद १० से २० साल के बीच पैदा हुए लोग अब और क्या देखना चाहेंगे. देश में अब तक होते रहे सबसे बड़े बदलावों को इसी उम्र के ही लोगों ने ही देखा है. इन्होंने अपने अब तक की उम्र के सफ़र में जय किसान जय किसान से लेकर सबका साथ सबका विकास को देखा है. इन्होंने हरित क्रांति, श्वेत क्रांति देखी पिछले दशकों में देखी तो देश में इमरजेंसी को भी देख लिया.
बचपन में उस रेडियो को भी देखा जो चालू करने के एक दो मिनट बाद ही मुंह खोलता था ये रेडियो वाल्व वाले थे, परिवर्तन आया रेडियो छोटे होते गए और चालू करते ही बोलने भी लगे. टेलीविज़न महानगरों से छोटे कस्बों की तरफ आया तो कला सफ़ेद आया था, और रंगीन हो गया, उसका छोटा चपटा गोल आकार अब तो चपटा ही हो गया और दीवारों पर बड़ी और बड़ी फ्रेम वाली तस्वीरों की मानिंद दीवारों पर टंग गया. कंप्यूटर के आने पहले देश में कंप्यूटर के नाम से ही राजनीतिक रोंगटे खड़े हो जाते थे और जब आया तो सब घरों में बढ़ते परिवार में सदस्यों का पर्सनल भी हो गया, नाम भी पीसी यानि पर्सनल कंप्यूटर हो गया. टेबल पर रखने वाले कंप्यूटर डेस्कटॉप का रंगरूप भी बदला और लोगों की गोद में लाडला बनकर लैपटॉप भी बन गया.
सन्देश भेजने के लिए चिट्ठी और तार भी गायब होकर ईमेल हो गए और इसे करने में कंप्यूटर ने अपनी करामात दिखाई. इन्टरनेट के साथ मिलकर इसने बहुत कुछ देश भर में बदल कर रख दिया. प्रिंटिंग के खटर पटर को भी निपटाकर चींची वाले प्रिंटर से लेकर चुपचाप चलने वाले प्रिंटर भी आ गए. प्रिंटिंग के मशीनी युग ने हाथ से काम करने वाले पेंटर को धीरे धीरे भुला दिया, अब तो दीवार पोतने वाले पुतैये भी आधुनिक तकनीक के दम पर काम मांगने लगे हैं. चूना और रामरज अब गरीबों की दीवारों से भी लुप्त होने लगे हैं, उनकी जगह बाहर और अन्दर की दीवारों के लिए अलग अलग रंग आने लगे हैं, जिसकी जितनी चादर उतने उसके पैर इन रंगों से पुतने लगे हैं.
पुराने दूरभाष यंत्र ने भी अपना हुलिया बदलने में कोई कसर नहीं छोडी पहले बात करने के लिए इस्तेमाल में दोनों हाथ लगते थे एक हाथ में स्पीकर मुंह से लगाना पड़ता था और दुसरे हाथ में रिसीवर थामकर कान से लगाकर सुनना पड़ता था जब कोई बात करता था तो बहुत जोर से बोलता था और ध्यान से सुनता था, उसने अपना रूप बदला स्पीकर और रिसीवर को एक साथ मिला दिया ये अब एक हाथ वालों के लिए भी काम का था, तब तक ये टेलेफोन विभाग के चंगुल में था वहां बैठे ऑपरेटर एक तरफ के आदमी को दुसरे से जोड़ने का काम करते थे. टेलीफोन ने उनके चंगुल से छुटकारा पाया और ऊँगली से नंबर घुमाने वाला बन गया. कुछ ही दिनों ये एसटीडी और आईएसडी भी करने लगा.
फिर दौर शुरू हुआ मोबाइल का, इसने तो कमाल पर कमाल करना ऐसा शुरू किया रोज कुछ न कुछ सुनाई पड़ने लगा है. पहले इसका आकर टेलेफोन के हैंडसेट जितना आया जिसने तार वाले टेलीफोन से लोगों को छुटकारा दिलाकर चलते फिरते बात करने की राह दिखाई, उसके बाद तेजी से बदलते हुए छोटा और छोटा होते हुए हाथ की हथेली से भी छोटा कर दिया. इस मोबाइल के बच्चे ने इतने रंग बदले कि लोगों को हर रोज़ ललचाया भी और भ्रमित खूब किया. इसने फोटोग्राफी पर भी हमला करते हुए फोटोग्राफी के कैमरों को बदलते देख कर कैमरे भी मोबाइल में ठूस दिए और सबको हर जगह फोटोग्राफर बना दिया. फोटोग्राफी से वीडियोग्राफी तक को मोबाइल में डाला और फिर आगे से अलग और पीछे से अलग अलग कैमरे के साथ स्क्रीन भी दाल दी. इस अकेले मोबाइल ने टेलीफोन, टीवी और कैमरे को उँगलियों पर नाचने वाला ही नहीं बनाया बल्कि लोगों को इसके सहारे चलने वाला बना दिया. इसने सन्देश के आदान प्रदान के अब तक के सभी संसाधनों के प्रयोग को हाथ में छोटे लेकिन सस्ते से महंगे खिलौना बनकर खुद को सबकी जरुरत बना लिया है.
टेक्नोलॉजी के दौर में एक समय बेरोजगारी को बढाने वाले कंप्यूटर ने लगातार अपनी उपयोगिता में नए नए परिवर्तन देते हुए दुनिया की हर एक चीज को बदला और लाखों करोड़ों लोगों को रोजगार से जोड़ दिया. इतने सारे क्षेत्रों में बदलाव हुए हैं कि उनकी लिस्ट बना पाना भी शायद संभव् नहीं होगा.
इस दौर में जो कोरोना परिवार के कोविद१९ वायरस ने कोहराम मचाया है इससे तो जिस उम्र के लोगों का जिक्र किया है वो लोग अब कुछ और देखना शायद नहीं चाहेंगे. दुनियाभर में अनेक प्रकार की बीमारियों और उनके इलाज के बदलावों को भी देखा. हालाँकि इस पूरे काल में आयुर्वेद की चिकित्सा पद्धति जितनी सनातन काल में उपयोगी रही उतनी ही आज भी कारगर है और इसे मानने को दुनिया तैयार भी है. इस वय के लोगों ने पर्यावरण का नाश होते देखा है, जंगलों का विनाश देखा है, जल स्त्रोतों की दिन प्रतिदिन बढ़ती दुर्दशा को देखा है. अब शायद यही कहेंगे कि और नहीं बस और नहीं.

भारत भूषण आर गाँधी

2 thoughts on ““सरोकार” : भारत भूषण आर गाँधी – और नहीं बस और नहीं …

  1. भारत भूषण जी
    कितने परिवर्तन या यूं कहिए कई सुखद परिवर्तनों की चपेट में आने के बाद हमेशा लगता है कि जिंदगी 10 से 15 साल पीछे चली जाए और वह सब रहे जो अभी है क्योंकि ना जाने अभी और कितने अच्छे परिवर्तन आने हैं और हम जिस पीढ़ी के लिए आपने यह लेख लिखा है वह उन सुखों को भोगने के लिए जीवित ना रहे।

    ऐसी ही चलती है जिंदगी। अजय गंगराड़े

    1. अजय जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार। आपने 10-15 साल ज़िंदगी को और पीछे लेकर और अधिक परिवर्तन को देखने और सुख लेने की बात कही है। आपमें जीवटता प्रतिलक्षित होती है।

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