Devendra Soni May 22, 2020

    समकालीन यथार्थ से मुठभेड़ करती पैनी लघु कथाएं
    समीक्षा : घनश्याम मैथिल अमृत

पुस्तक विवरण:चाणक्य के दाँत, लघुकथा संग्रह, कर्नल.डॉ. गिरिजेश सक्सेना ‘गिरीश’,
प्रथम संस्करण- 2019, आकार21.5से.मी.x14.5 से.मी.आवरण बहुरंगी पेपरबैक,पृष्ठ-136
मूल्य रु 200/- +35/- डाक व्यय
प्रकाशक: अपना प्रकाशन,
भोपाल-462023

‘ लघुकथा‘ गद्य साहित्य में कथा परिवार की सबसे लघु सदस्य है | अपने सीमित आकार में किसी घटना अथवा क्षण विशेष को बिना किसी भूमिका अथवा विस्तार के पूरी तीव्रता और प्रभाव के साथ व्यक्त करने का लेखकीय कौशल ही लघुकथा है | मुझे स्मरण आता है एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक आयोजन की अध्यक्षता करते हुए ख्यातनाम व्यंगकार पेशे से चिकित्सक पद्मश्री डाक्टर ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा था –“ अथाह जल राशि से भरे समुद्र से एक चम्मच पानी ले कर यदि उसका परीक्षण किया जाय तो उसमें समुद्र जल के समस्त गुण धर्म मौजूद होंगे,यानि लघुकथा में आकार और विस्तार को छोड़ दें, तो कथा के समस्त गुण और विशेषताए पाई जाती है “| इसी सन्दर्भ में पिछले दिनों लघुकथा शोध केंद्र भोपाल द्वारा आयोजित “लघुकथा पर्व- २०१९” के अवसर पर प्रथम अखिल भारतीय माधव राव सप्रे लघुकथा सम्मान से सम्मानित वरेण्य वरिष्ठ लघुकथाकार श्री भागीरथ परिहार की लघुकथा संबंधी परिभाषा भी उल्लेखनीय हैं , कि –“ लघुकथा जीवन के अणुओं को सूक्ष्म दर्शी से देखने का प्रयास है , यह सूक्ष्म साहित्य यह बताने की क्षमता रखता है , कि जीवन में जो भी सूक्ष्म है वह महत्त्वपूर्ण है , ठीक उस परमाणु की तरह जो शक्ती का स्त्रोत होता है “
आज हम सभी यह अच्छी तरह से जानते है कि भाग दौड़ और आपाधापी से भरी जिंदगी में हर आदमी के पास समय की बड़ी कमी है | बहुत कम समय में अधिक पाने की चाह ने हमारे जीवन जीने की शैली को बदलकर रख दिया है | आज का समय त्वरित गति का समय है | इस”रेपिड एक्शन पीरियड” में हर जगह “माइक्रो” यानि सूक्ष्मता का बोलबाला है| फिर भला साहित्य जगत इससे कैसे अछूता रह सकता है और फिर यदि एक उपन्यास और लंबी कहानी का मर्म , सन्देश अथवा पाठकीय संतोष यदि एक लघुकथा में पाठक को मिल जाये तो वह सहज ही लघुकथा की ओर आकर्षित होगा , बस शर्त है कि “ लघुतामें प्रभुता “ हो “ वामन में विराट के दर्शन होँ, क्योंकी यहाँ अतिरिक्त शब्दों के लिए कोई जगह नहीं , इसीलिए लघुकथा लेखन एक दुष्कर कार्य है , भाव , कथ्य, शिल्प, में ज़रा भी चूके कि सँभालने का कोई अवसर ही नहीं |
मध्य प्रदेश की राजधानी में जबसे “ लघुकथा शोध केंद्र भोपाल “की स्थापना हुयी है ,तबसे साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिखने वाले अनेक युवा और वरिष्ठ साहित्यकार केंद्र पर लघुकथा की नियमित होने वाली गोष्ठियों में सम्मिलित होते रहे है | यहाँ केंद्र की संस्थापक और निदेशक कांताराय के सानिध्य और मार्गदर्शन में न सिर्फ रचनाकार लघुकथा पाठ सुन रहे है , अपितु लिख भी रहे है ,और इन लघुकथाओं पर होने वाले सतत विमर्श और समीक्षा से लघुकथा लेखन के व्याकरण को भी आत्मसात कर रहे हैं |इसी के परिणाम स्वरुप पिछले दो वर्षों में ही अनेक नवोदित और स्थापित साहित्यकार लघुकथा लेखन से गंभीरता पूर्वक ना सिर्फ जुड़े , बल्कि उनका सृजन एक लघुकथा कृति के रूप में पाठकों के सम्मुख भी उपस्थित हुआ |
लघुकथा शोध केंद्र भोपाल की इन्हीं उपलब्धियों ने आज एक महत्त्वपूर्ण नाम और जुड़ने जा रहा है , वरिष्ठ साहित्यकार कर्नल डाक्टर गिरिजेश सक्सेना का , जिनकी कविता कहानी संस्मरण की अनेक कृतियों के प्रकाशन के पश्चात अब लघुकथा कृति “ चाणक्य के दांत “ सुधि पाठकों के सन्मुख है | भारतीय सेना चिकित्सा कोर से सेवा निवृत सैन्य अधिकारी गिरिजेश जी धरातल से जुड़े वो व्यक्ति है , जिन्होंने ज़मीन से लेकर आस्मां का सफर अपनी मेहनत के बूते किया है , उन्हें जहां गाँव और गरीबों को करीब से देखने का अनुभव है वहीँ उन्होंने पांच सितारा ‘ वी आई पी कल्चर ’ को भी निकट से देखा है , इस प्रकार वे आकाश में विचरण करते हुए अब अपनी ज़मीन को नहीं भूले और इस दीर्घ जीवन में उन्हें जो भी खट्टे मीठे अनुभव हुए है , उन्हें कर्नल साहब ने लघुकथाओं के माध्यम से कागज पर उकेरा है | उनकी कथाओं के पात्र उनके अपने जीवन से जुड़े सच्चे चरित्र हैं | कृत्रिमता और बनावटीपन से मुक्त , इसलिए ये पाठक को भी अपने से लगते है और वह इन लघुकथाओं से स्वयं को ऐसे जुड़ा हुआ अनुभव करता है , जैसे वह इन घटनाओं का स्वयं पात्र अथवा हिस्सा रहा हो| ये लघुकथाएं पाठक को कभी दुलारती है , कभी फटकारती है , कभी गुदगुदाती है तो कभी चुभती है,ये लेखकीय कौशल ही है कि हर लघुकथा में छीजते दिशा विहीन होते समाज की चिन्ता है , चिंतन है , सहज सरल भाषा में बिना किसी भाषाई आडम्बर और चमत्कार के अपनी बात उन्होंने इन लघु कथाओं के माध्यम से पाठकों के समक्ष रखी है | लेखक की अपनी जो पृष्ठभूमि होती है उसका लेखन उससे अछूता भला कैसे रह सकता है अतः सेना और चिकित्सा के जीवनुभव के भाव भी इन लघु कथाओं में सहज दृष्टी गोचर होते है |
हालाँकि पाठक और लेखक के बीच किसी मध्यस्थ की भूमिका का बहुत ज्यादा औचित्य नहीं फिर भी एक समीक्षक दो ध्रुवों के मध्य एक सेतु का कार्य तो कर ही सकता है | आइये गिरिजेश जी के संग्रह की कुछ लघुकथाओं से आपका संक्षिप्त परिचय करवाऊँ| “ दो कदम भी ना चले “अंध विश्वास से लड़ती लघुकथा है , कैसे समाज में आज भी बच्चों को असमय मृत्यु से बचने के लिए उनके उल्टे-सीधे नाम रख दिए जाते है| “ आवाज़ दो हम एक हैं” लघुकथा में ज़रा–ज़रा सी बातों में आपसी झगड़ा और प्रतिस्पर्धा को उकेरा गया है| “ चेहरे पर लिखे दाम “ एक आम अनुभव की लघुकथा है, कैसे दूकानदार ग्राहक और उसके हैसियत देख कर वस्तुओं के दाम तय करते है | “ नक़ल में अकल” मुहावरे को बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत करती लघुकथा है | “ बाज़ी “ हृदय को हिला देने वाली मार्मिक लघुकथा है , कैसे शतरंज के खेल में नशे की तरह डूबे खिलाडी अम्मा की तबियत खराब होने से अम्मा मर ही जाती है परन्तु अपनी बाज़ी नहीं छोड़ते , यह लघुकथा हमें प्रेमचंद की “ “ कफ़न “ कथा का स्मरण कराती है | “भूख “ लघुकथा भूख का अहसास कराती है | जब भूख लगाती है , या जिसे भूख लगाती है तभी इसका सच्चा अहसास होता है |”पेट की आग” में भी बताया गया है के भूख कितनी निर्मम होती है , भले बाबूजी मर गए परन्तु भूख नहीं मरी , भूख की आग चिता की आग से कम नहीं , बहुत प्रभावी लघुकथा |” गजानन उवाच में पर्यावरण की पीड़ा है , किस तरह प्रतिमा विसर्जन से हमारी नदियाँ हमारे सरोवर दूषित हो रहे है |” कूकर सभा “ एक अच्छी व्यंग लघुकथा है, जो कुत्तों के माध्यम से हमारे समूचे मानव समाज पर कस कर तमाचा मारती है | “ मेरी मिट्टी” एक सैनिक का अपनी मातृभूमि से प्यार का भाव दर्शाने वाली भावना पूर्ण लघुकथा है | “ तीसरा नेत्र” धरती प्रकृति के साथ अत्याधिक शोषण बिगड़ते पर्यावरण के गंभीर दुष् परिणाम होंगे, बताती लघुकथा है |”चुटकी की ताकत “ किसी व्यक्ति को छोटा समझने की भूल ना करें इसी प्रकार “ चाणक्य के दांत “ , हस्तरेखा-ज्योतिष एवं समुद्र शास्त्र के जंजाल से मुक्त हो कर्म की प्रधानता को स्थापित करती लघुकथाएं है | वहीँ “खुदा” लघुकथा में कैसे एक मरीज़ डाक्टर को भगवान का रूप मानता है बताया गया है | “डूबते सूरज “बुजुर्गों के बच्चों द्वारा अवहेलना की व्यथा कथा है वहीँ “ मैं माँ हूँ द्रोपदी नहीं “ एक माँ की करुण कथा , संपत्ति की तरह का बँटवारा करती संतानों पर सटीक प्रहार है , इसी प्रकार श्रम का अभिमान , सत्ता परिवर्तन , दस्तूर , ट्रायल , शेरनी , सपनों की राख आदि लघुकथाये भी विविध सामाजिक विषयों पर केंद्रित प्रभावी लघुकथाएं है | यह गिरिजेश जी का लघुकथा पथ पर पहला सोपान है | उन्हें अभी लंबी यात्रा तय करनी है , इन लघुकथाओं में वरिष्ठ लघुकथा लेखकों आलोचकों को कुछ कमियां भी दिख सकती हैं , परन्तु इस सबके बावुजूद यह लघु कथाएं आम आदमी की पीड़ा का दस्तावेज है , यह लोगों के दर्द की मुखर अभिव्यक्ति है , निश्चित ही यह लघुकथाएं पाठक के मन को झकझोरने,समाज में व्याप्त विद्रूपताओं , विसंगतियों को बुहारने का काम करेंगी , लघुकथाकार गिरिजेश जी के इस प्रथम लघुकथा संग्रह प्रकाशन पर बहुत बहुत बधाई |

घनश्याम मैथिल “ अमृत”
‘प्रणाम‘ जी/ एल ४३४ – अयोध्या नगर ,
भोपाल-४६२०४१ मप्र ९५८९२५१२५०

3 thoughts on ““चाणक्य के दाँत” : समकालीन यथार्थ से मुठभेड़ करती पैनी लघु कथाएं – समीक्षा , घनश्याम मैथिल अमृत

  1. चाणक्य के दॉत पुस्तक की इतनी सार्थक समीक्षा, घनश्याम जी ने रची है अच्छा लगा।लेखन सार्थक हुआ।

  2. manneey ! mail par aapka e paper padh kar bahut sukhad laga . pustak sameeksha ghanshyam jee ne bahut gahan vichaar ke baad likhi lagti hai . sampadak mandal ka bahut aabhaar . pryatn kiya hindi me type karun par hindi font nahin aaya kshma karen

  3. “चाणक्य के दॉत”की भूरि भूरि चर्चा सुनी थी, समीक्षक ने पुस्तक का पूरा माहौल परिदृश्य मे डाल दिया जैसे पुस्तक को आद्योपान्त पढना आवश्यक लगता है ।

Leave a comment.

Your email address will not be published. Required fields are marked*