Devendra Soni May 20, 2020

*पता नहीं मैं क्या चाहती हूँ*

पता नहीं मैं क्या चाहती हूँ
खुद में उलझ कर ही मैं रह जाती हूँ।

कभी इस दुनिया में मैं रौनक देख पाती हूँ
तो कभी अकेलापन।
कभी इस संसार में मैं सबके साथ होंना चाहती हूँ
तो कभी मैं चाहती हूँ एकांत।

पाना चाहती हूँ अलग ही स्वाभिमान,
फिर सोचती हूँ क्या पाना जरूरी है यह मुकाम।
लगता है इस दुनिया से दुर चली जाऊँ
फिर सोचती हूँ क्यों ना मैं कसी की मदद ही कर पाऊँ।।

कभी सोचती हूँ सब तो है मेरे पास
फिर सोचही हूँ,कुछ भी तो अपना नहीं है मेरे पास।
जब देखती हूँ अमीरो की शान तब गरीबो को देखर
सोचती हूँ फिर भगवान इनका क्यों लेता है इम्तिहान।।

पता नहीं मुझे इसानों से ज्यादा जानवरों से प्यार है
या ए कहूँ कि जानवर ही मेरे यार है।
जब कभी नींद मुझे सताती है तो
चांद को देखकर अलग ही सुकून आ जाती है।।

जब मैं कभी परेशान हो जाती हूँ
चित्र बना कर मन सांत कर लेती हूँ।
पता नहीं मैं क्या चाहती हूँ
खूद में उलझ कर ही मैं रह जाती हूँ।।

प्रियल शार्मा
शा०कन्या उ० मा० विद्यालय
प्रतापपुर (टी) जिला सूरजपुर (छ०ग०)

7 thoughts on “प्रतापपुर से प्रियल शर्मा की रचना -पता नहीं मैं क्या चाहती हूँ

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