अनिल अबूझ , चित्तौड़गढ़(राज.)की नई कविता – परियां

नई कविता –
परियां

कुछ ऐसी परियाँ थीं
जो इस रेगिस्तान में बसंत खोजने आई थी
उन्हें लगा था कि
दलितों, किसानों, मजलूमों की बात
करने वाले इस शख्स के
घावों पर मलहम लगा
इसे पुन: हरा भरा किया जा सकता है
उन्हें लगा
कि अपने में ही रहने वाले
छुपी हुई कहने वाले
इस शख्स के बंजर दिल पर
ऊगेगी कोई कोंपल
हरियायेगी ये जमीं
खिलेंगे फूल बनेगा चमन
प्रेम के पंछी डालेंगे डेरा
एक किरण लेकर आई थी
उम्मीद की
कि
इस कवि ने
प्रेम का प्याला जो पी लिया
एक बार
तो क्या गजब होगा
भौतिकता का ज्ञान जो हो गया एक बार
तो ये प्रतिभाशाली युवक
सोने की खान सा चमक उठेगा
तमाम कोशिशें उनकी
रंग न ला सकी लेकिन
कवि जो बनते हैं
भौतिकता से ऊबकर बनते हैं…
रेगिस्तानों में कहाँ
फूलों के बाग पनपते हैं!!

– अनिल अबूझ
एडीशनल जेएम. कोर्ट,
चित्तौड़गढ़(राज.)

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