Devendra Soni May 9, 2020

वर्तमान परिदृश्य में अपनी दूधबोली (कुमाऊंनी भाषा) में एक रचना का अल्प-प्रयास !

दुखौक बखत पहाडैकि याद

नबुवा त्वील पहाड़ किलै छोड़ ?

गौं-घर छोड़ि दिल्ली हुणि बाट लाग,
ठुल-सैप बणुल कबेर मनसुप लाग !
गुलामुकि जैसी नौकरी में मस्त है गैए,
कसि मत्ति भैई ! के ख्वार आग लाग ?
स्वर्ग जैसि जन्मभूमिकि त्वील परवा नि करि,
आपणी ऐंठ में पहाड़ हबेर मुख मोड़,
नबुवा त्वील पहाड़ किलै छोड़ ?!

के कर त्वील यां, के खाय, के कमाय ?
द्वि हफ्त लौकडाऊन लै त्वील थै नि पाय !
जमीन सब पहाडैकि बांज पड़ि रै,
यां डाब जौस मकान में दुबकि भाय !!
यसै जै करण छियौ पहाड़ के नौक छि,
किलै त्वील वां बटिक रिश्त टोड़ ?
नबुवा त्वील पहाड़ किलै छोड़ ?!

नौव-धारौक ठण्ड-ठण्ड पाणि पीनै,
हिसाव, किल्मोड़ि, काफल खानै !
और के नै तो गोर चरुण हुणि जानै,
यौ महामारी हबेर आपण जन्मभूमि में रुनै !!
साल भरिक खाहूं ग्युं, धान, आलु उगुनै,
कभतै घौत, भट्ट, मडुवै लै ल्हिनै गोड़ !
नबुवा त्वील पहाड़ किलै छोड़ ?!

चाहुणि लै नि गेये घर-कुड़ी लै बज्येई,
आब ऐल के है संकू? पैली अक्कल नि भई !
पहाड़ लै कुन्हौल आब ऐगेछौ याद,
मांग-खाणि जैसि जब तेरि हालत है गेई
फाटी लुकुड़ त्वील यां जरुर पैरन्हाल,
पै भुख पेट तुकु पहाडैल कभै नि छोड़,
नबुवा त्वील पहाड़ किलै छोड़ ?!

नवीन जोशी ‘नवल’
दिल्ली

25 thoughts on “बुराड़ी दिल्ली से नवीन जोशी नवल की कुमाऊंनी भाषा में रचना -दुखौक बखत पहाडैकि याद

  1. मेरी कुमाऊंनी रचना को स्थान देने के लिए सहृदय आभार टीम “युवा प्रवर्तक” एवं प्रधान संपादक श्रद्धेय श्री देवेन्द्र सोनी जी 🙏!

    1. कुमाऊँनी समाज के साथ साथ उत्तराखण्ड के लिए भी गर्व का विषय ।
      बहुत ही सुन्दर रचना

  2. बहुत सुन्दर कविता 👌जय देवभूमि उत्तराखंड🙏

  3. बहुत सुंदर कविता “जय देव भूमि उत्तराखंड” भारत माता की जय

  4. कुमाऊँनी समाज के साथ साथ उत्तराखण्ड के लिए भी गर्व का विषय ।
    बहुत ही सुन्दर रचना

  5. अति सुंदर रचना। पहाड़ से जब रोजगार के लिए लोग पलायन करते हैं, तब यही सोचता है कि मैं खूब धन कमाऊंगा। परन्तु एक महामारी ने सबकी हालात खराब कर दी, और लोग वापस पहाड़ की ओर मुड़े। मतलब अपना घर स्वर्ग से सुंदर।

  6. अति सुंदर रचना। पहाड़ से जब रोजगार के लिए लोग पलायन करते हैं, तब यही सोचता है कि मैं खूब धन कमाऊंगा। परन्तु एक महामारी ने सबकी हालात खराब कर दी, और लोग वापस पहाड़ की ओर मुड़े। मतलब अपना घर स्वर्ग से सुंदर।

  7. बहुत ही सुन्दर रचना। हमारा उत्तराखंड सवर्ग से भी महान है
    अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।
    जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥

    अनुवाद : ” यद्यपि यह लंका सोने की बनी है, फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। (क्योंकि) जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।

  8. भोत भल कविता छ इमजी सच्चाई छ की हम सबूल पहाड़ के कसी भूल गयो ओर जब आज मुसीबत आगे त याद आगे पहाड़ क

  9. दाज्यू पैलाग तुमुल हम नवोदित कुमाऊँनी कवि नैक मन मा लै आश जगै रै।
    भौतें सुन्दर रचना छू ,भौत भौत बधाई

  10. अच्छा लिखा है, ये ही वास्तविकता है

  11. भौत बढि कविता छू !
    नबुवा जड़ जटिल पहाड़ की अकाव, अभाव व अभिशाप की जिंदगी से निकलने सघर्ष करने निकल पड़ता है लेकिन मॉ का प्यार उसे घर में ही जंगल में ही मंगल करने को कहता है.

  12. उपरोक्त रचना की अमूल्य समीक्षा द्वारा मनोबल बढ़ाने हेतु बहुत बहुत आभार आप सबका, श्रीमान राजू उप्रेती जी, बबीता जी, पूनम जी, इंदर सिंह बोरा जी, विवेक पांडे जी, हेम जोशी जी, हेम चंद जी, चंद्रशेखर पांडे जी, हेम चन्द्र पाण्डे जी, संजय सत्यवली जी, बहन मनोरमा सुयाल रावत जी, निशिकांत जी, राघव सिंह जी, महेश कुमार जी, जीवन सवारो जी, वीर सेन सिंह जी। आप सभी का अंत:करण से आभार व्यक्त करता हूं 🙏।

  13. Sir bahut hi achche sabd piroye hai aapne , mahabharat me duryodhan ki mahtwakancha ne use jine diya, aur yahan saharon ki uttam jivan ki mahtwakancha ne hame pahar nahi rahne diya. Parimam ek jaisa hi hai.

    1. बहुत बहुत आभार आपका श्री विनोद तिवारी जी एवं श्री हेमन्त सिंह बिष्ट जी, आपकी अमूल्य समीक्षा से मनोबल बढ़ा 🙏!

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