Devendra Soni March 30, 2020

*मैं मोबाईल बोल रहा हूँ*

मैं मोबाइल बोल रहा हूँ आज मैं बहुत परेशान हूँ और आपलोगों को कुछ आप बीती बताना चाहता हूँ।
आज देश वैश्विक संकट कोरोना से जूझ रहा है। वहीं अपने देश में अपने प्रधानमंत्री श्री मोदी जी ने सारे देश को लोकडाउन कर रखा है। सारे हिंदुस्तानी घर पर बैठे हए है मुझे पकड़कर। मुझे एक मिनट के लिए भी आराम नहीं दे रहें मैं भी वैसे ही सेवा कर रहा हूँ जैसे किसी हॉस्पिटल में डॉक्टर भगवान का अवतार लेकर कर रहें हैं। मुझे भी थकावट महसूस होती है किंतु चैन नहीं । इंसान के कोरोना वायरस कहीं मेरे अंदर न आ जाये,यही डर सता रहा है।
आदमी को तो आशोलेट किया जा रहा है किन्तु मेरे आइसोलेशन का चीरहरण हो रहा है , खैर !अब कर ही क्या सकता हूँ। मैं कोई आदमी तो हूँ नहीं लेकिन फिर भी इस संकट की घड़ी में पूरी मानवता के साथ खड़ा हूँ कंधा से कंधा मिलाकर, पल-पल की अपडेट दे रहा हूँ।
ये सज्जन जो मोबाइल पर लिख रहें हैं अभी थोड़ी देर पहले बैठे हुए थे जब इन्हें थकान महसूस हुई तो लेटकर लिखने लगे किन्तु मोबाइल छोड़ने का नाम नहीं ले रहे हैं।
जब मैं नहीं था तो ये रोज कलम लेकर डायरी में लिखा करते थे। अब ये भी आलसी हो गए हैं डायरेक्ट मेरे ऊपर ही लिख रहे हैं कई फाइल बना रखीं हैं कहीं गूगल पर, कहीं नोटपैडकहीं वर्डपैड पर आदि -आदि, कितनी गिनाऊँ!
अब तक तो इन पर गुस्सा आ रहा था किन्तु आज इन पर प्रेम उमड़ रहा है कम से कम इन्होंने मेरी पीड़ा को समझा और लिख रहे हैं। आज कितने लोग हैं जो दूसरों की पीड़ा को समझते हैं और उनके लिये कुछ करते हैं।
अरे! मूल समस्याओं को बताना भूल ही गया हूँ। मैं इंसान के इतने काम आ रहा हूँ आजकल मेरे बिना इसका जीवन इनकम्प्लीट है ये वो भलीभांति जानता है। कोई भी फंक्शन मेरे बिना अधूरा है,माताओं के पास समय नहीं है उनके बच्चों को संगीत से रात की लोरी तक का कॉन्ट्रैक्ट मेरे सिर मढ़ा हुआ है।
इंसान एक बार अपनी वाइफ को भूल सकता लेकिन मेरे बिना नहीं रह सकता। मुझे अपनी लाइफ लाइन बोलता है। काश ! इंसान इतनी मोहब्बत अपनी वाइफ से करते तो न जाने कितने परिवार उजड़ने से बच जाते।
खैर ये उनका पर्सनल मामला है मुझे फ़टे में टाँग अड़ाने से क्या फायदा? आज यही समस्या है- *आदमी अपने दुख से दुखी नहीं है दूसरे के सुख से दुखी हैं।*
लगता है मेरे अंदर भी इंसानों के लक्षण आ गए हैं। मैं किसी से भी ईर्ष्या नहीं करता हूँ। जिसके हाथ में पहुँच जाता हूँ उसी के आदेश का पालन करता हूँ। जैसे भी चलाता है उसी प्रकार चलने को अपनी नियति मान लेता हूँ ,तभी खुश रह पाता हूँ अन्यथा जीवन बोझ बन जायेगा।
चलिए एक कष्ट और बताता हूँ आपको आजकल लोग मुझे अपने टॉयलेट में भी साथ ले जाते हैं वहाँ भी नहीं छोड़ते हैं।
खुद तो हाथ साफ लेगा सेनेटाइज कर लेगा लेकिन मैं अकिंचन वैसा ही रह जाता हूँ। हद तो तब हो जाती है खुद नहा धोकर पवित्र होकर पूजा घर में आता हैं किन्तु मुझे वैसे ही घसीट ले जाता है मेरी अपवित्रता को नजरंदाज कर देता है कि मैं भी अभी अभी उसी टॉयलेट से निकला हूँ और आरती मुझसे ही करवाता है, यहीं सर्वाधिक दुखी होता हूँ।
_आखिर मेरा भी धर्म ईमान है सब भृष्ट कर दिया इस इंसान ने।_ भगवान से फिर भी इसके लिये दुआ करता हूँ यह सुखी रहें हमें तो हर हाल में इसकी गुलामी करनी है रोकर करूँ या हँसकर। बिडम्बना देखिए लोग खुलेआम बातें करते हैं,प्रेमी जन छुपकर बातें करते हैं।प्रेमिकाओं की तो बात ही छोड़िए कोई देख न ले इसलिए वे ऐसी-ऐसी जगह छिपा लेती हैं मैं बता भी नहीं सकता, शर्म का काम करें वे और शर्मिंदा मुझे होना पड़ता है। हमारी _रेपुटेशन_ खाक में मिल जाती है जिसकी कोई चिन्ता नहीं करता।
कभी कभी तो बैटरी डाउन हो जाये फिर भी नहीं छोड़ता चार्जिंग लगाकर लगा रहेगा मुझे आराम बिल्कुल नहीं मिलता मैं बहुत दुखी हूँ इसलिए ये पीड़ा सुना रहा हूँ।
कहते दीवालों के भी कान होते हैं लेकिन आज तो मीडिया,सोशल मीडिया का जमाना है हो सकता आपके पास भी मेरी पीडा पहुँच जाये तो आप भी पड़कर खुश हो लेना कुछ कर सको तो कर लेना। मुझे छुटकारा दिलाओ कैसे भी इस इंसान से। यह इंसान सोशल मीडिया पर तो दिनभर लगा रहेगा लेकिन आज मानवता कराह रही है उसके लिये सोशल नहीं है। पूरा देश वायरस की चपेट में है तब वह मेरे साथ रंगरेलियां मना रहा है घर में बैठकर । सरकार को कोस रहा है कि सरकार कुछ भी नहीं कर रही लेकिन खुद हाथ पर मोबाइल रखकर बैठा हुआ है।आज राष्ट्र जब गम्भीर संकट में तब इस इंसान से मेरी इतनी ही विनती है-
*’हे आर्यपुत्र उठो मेरा मोह त्यागो और राष्ट्र के निर्माण में कुछ योगदान सुनिश्चित करो’*
मेरी तो यही अभिलाषा है कि मैं रहूँ या न रहूँ ये राष्ट्र रहना चाहिए।

डॉ राजीव पाण्डेय
(कवि,कथाकार,व्यंग्यकार,हाइकुकार, समीक्षक)
1323/भूतल,सेक्टर-2
वेबसिटी, गाजियाबाद(उत्तर प्रदेश)
मोबाइल-9990650570
Email- kavidrrajeevpandey@gmail.com

14 thoughts on “गाजियाबाद से डॉ. राजीव पांडेय का लेख -मैं मोबाईल बोल रहा हूँ

  1. सत्य पर एक सुन्दर व्यंग्य युक्त सार्थक लेख ।

  2. सत्य पर एक सुन्दर व्यंग्य युक्त सार्थक लेख ।

  3. आदरणीय डॉ.राजीव पांडेय जी,सादर नमन और उत्कृष्ठ निबंध लेखन ” मैं मोबाइल बोल रहा हूं” के लिए कोटिशः बधाइयां। व्यंग्यात्मक निबंध /लेख को पूर्ण रूपेण पढ़ा। एक उपकरण को मानव के अरूप में बुद्घिमानों से अपनीव्यथा -कथा,विविध भूमिका,पर उपकार धर्मिता,मानव जीवन की विडंबना,मोबाइल से अतिशय और अटूट लगाव,जीवन की सांस -सी उसकी अपरिहार्यता,उपयोगिता, कार्याधिक्य से निरंतर व्यस्तता की चक्की में पिसते रहना और स्वच्छता के प्रति मोबाइल प्रेमी आधुनिक मानव की सजगता(!)पर कुठाराघात करने की भावनाओं को अभिव्यक्त करवाकर इस कोरोना महामारी से बचाव हेतु ‘ लॉकडाउन’ अवधि में मोबाइल की पीड़ा के माध्यम से मानव को मानव समाज से अपना तादात्म्य सदैव स्थापित किए रहने ,अति का वर्जन करने,औरों की वेदना की अनुभूति करने, दया- करुणा – सहयोग – परोपकार ,त्याग,मानवता का पालन करने और राष्ट्र हित हेतु सतत तत्पर व सन्नद्घ रहने का आह्वान वर्तमान परिस्थितियों में अत्यंत मूल्यवान और आवश्यक है।
    लेख की भाषा सुबोधात्मक,संदेशप्रद और अमूर्त का मूर्त खाका खींचने में सफल होने के साथ साथ यथार्थ की सृजनात्मक प्रतीति कराने में सक्षम है।
    मोबाइल धारकों की नब्ज को बड़ी बेबाकी और पारखी दृष्टि से पकड़कर उसके उपचार हेतु उत्तम उपाय का परामर्श बेजोड़ है।
    धन्यवाद।
    आपके कारण पटल पर कुछ पढ़ने और अभिव्यक्त करने का सुयोग बन जाता है।शुभकामनाएं।
    स्नेह अभिलाषुक,
    राघवेन्द्र पांडेय

  4. *’हे आर्यपुत्र उठो मेरा मोह त्यागो और राष्ट्र के निर्माण में कुछ योगदान सुनिश्चित करो’*
    मेरी तो यही अभिलाषा है कि मैं रहूँ या न रहूँ ये राष्ट्र रहना चाहिए।*…… राष्ट्र हित मेंं क्या आदेश है नन्द नंदन 🙏

  5. बेहतरीन रचना, एक अच्छा संदेश देती हुई रचना ।बहुत बहुत बधाई और साधुवाद

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