Devendra Soni March 26, 2020

*लॉकडाउन संदर्भित ग़ज़ल*

*घर में ही बने रहना*
– *डॉ. (सुश्री) शरद सिंह*

अपनी न करो लेकिन अपनों की फ़िकर करना।
घर में ही बने रहना, बाहर न क़दम रखना।

कुछ दिन की मुसीबत है, इक दिन तो टलेगी ही
डरने की ज़रूरत क्या,चौकस है बने रहना।

आपस में बना दूरी, दुनिया को दिखाना है
हम पास दिलों से हैं, फिर कैसा भला डरना।

चाहे वो कोरोना हो या और कोई दुश्मन
साहस से डटे रहना, हमको है नहीं झुकना।

हो वक़्त बुरा कितना, आख़िर तो बदलता है
दीवार कोरोना की, जल्दी है इसे ढहना।

सागर, मध्यप्रदेश

1 thought on “सागर से डॉ सुश्री शरद सिंह की ग़ज़ल -घर में ही बने रहना

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