Devendra Soni March 26, 2020

विश्व बहुत ही विषम परिस्थितियों में घिरा हुआ है, और इन परिस्थिति में एक सामान्य स्त्री की अन्जाने भय से घिरी मानसिकता को दर्शाने का प्रयास करते हुए ,प्रभु से करबद्ध प्रार्थना करती मेरी ये कविता.

* सहमी जननी*

मैं इक जननी हूँ
वसुधैव कुटुंब की धुरी भी मैं ही हूँ
घबरा ही गई हूँ
जग के आपातकालीन परिस्थिति से
स्तब्ध हो गई हूँ
दहशतपूर्ण ख्यालों से घिरी रहती सतत
दर्शाती भी नहीं हूँ
उस कर्तव्यनिष्ठ की अर्धांगिनी बनकर
कर्मपथ पर भेजती हूँ
करने जीवन रक्षक कर्तव्य का पालन
रोक कैसे सकती हूँ
मैं तो इस विषम परिस्थिति में ईश से
बस दुआ करती हूँ
ईश्वर मेरे सुहाग की रक्षा करना तुम
खुद भी जाती हूँ
घर से बाहर जरूरत के सामान लाने
और वापस आती हूँ
अंजाने भय से घिरी हुई अपने ही घर
कही मैं तो नहीं हूँ
वाहक बनी उस भयावह संक्रमण की
स्वयं को करती हूँ
परिशुद्धित बारंबार फिर भी आशंकित
सहमी सी रहती हूँ
कोखजनित को जब भी परोसने जाती
थाली को धोती हूँ
एकांतवास में अगर चली गई मैं ही तो
कांप सी जाती हूँ
सच अपने लिए तो सोचती ही नहीं कभी
व्यथित हो जाती हूँ
कौन चलायेगा मेरे घर की सारी व्यवस्था
डरी सहमी रहती हूँ
संवेदनाओं से लिप्त अतर्चेतना में अनवरत
प्रार्थना ही करती हूँ
जगदीश्वर सृष्टिकर्ता दया से भर दो झोली
मैं तो याचक हूँ
वसुधा पर खुशहाली हेतु मैं अनुनय विनय
प्रभु तुझसे करती हूँ ।

अंजना झा
फरीदाबाद
हरियाणा
यह मेरी मौलिक सर्वाधिकार सुरक्षित रचना है/

1 thought on “फरीदाबाद से अंजना झा की रचना -सहमी जननी

  1. बहुत बहुत धन्यवाद युवा प्रवर्तक पत्रिका को

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