Devendra Soni March 26, 2020

*एक ग़ज़ल देशबंदी यानी टोटल लॉकडाउन के दौरान…*
– डॉ. वर्षा सिंह

दौर है ये आज़माइश का, ज़रा धीरज धरो
कुछ दिनों की बात है फिर ख़ूब मनचाहा करो

स्याह पन्ने फाड़ कर उजली कथाएं कुछ लिखो
पृष्ठ जो हैं रिक्त, उनमें रंग जीवन का भरो

ख़ुद के दुख की दास्तानों का न कोई अंत है
भूल अपने ग़म सभी तुम पीर ग़ैरों की हरो

वक़्त है एकांत का, रहना स्वयं की क़ैद में
अब मनुजता को स्वयं के धैर्य से तारो- तरो

याद रखना वक़्त रुकता है न अच्छा ना बुरा
खेल सारा कुछ पलों का है तो आखिर क्यों डरो

मृत्यु की तय है घड़ी और ज़िन्दगी के दिन भी तय
सोच कर अंतिम क्षणों को किसलिए प्रतिपल मरो

शुष्कता ने बोरियत से भर दिया वातावरण
बन के “वर्षा”- बूंद, सूखी इस धरा पर तुम झरो

डॉ. वर्षा सिंह,
सागर, (म.प्र)

2 thoughts on “एक ग़ज़ल देशबंदी यानी टोटल लॉकडाउन के दौरान.. – डॉ. वर्षा सिंह,सागर

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