Devendra Soni March 26, 2020

ग़ज़ल
*नवजीवन का आवाहन है*

है आवाहन देश का घर से निकलना तू नहीं
फिर से नवजीवन मिलेगा यार डरना तू नहीं
ग़ज़ल

खौफ का मंजर शहर में मौत मंडराती है सर
वेवज़ह बेकार राहों में टहलना तू नहीं

सब नियम से गर चले सुख चैन की हो जिंदगी
हाँ उलंघन कर नियम फिर हाथ मलना तू नहीं

देश की ख़ातिर बशर सहयोग तेरा है अहम
सुन बहस करके पुलिस से अब उलझना तू नहीं

आज मानवता पे संकट है विकट तू जाने ले
मैं जवां हूँ जानकर मस्ती में चलना तू नहीं

स्नेहलता “स्नेह”
सीतापुर,सरगुजा छ.ग.