Devendra Soni March 25, 2020

पुनरावर्तन:महेश राजा/

    देखती है,रोज मेरी आंँखें।
    रंगबिरंगी दुपट्टे के सहारे चलती
    ….. वह लडकी।

    शाम की थकी हुई किरणों की तरह,
    .. . उतर आती है।

    उतर आती है,
    मेरे घर के सामने की सडक पर।
    .. लौट जाती है,
    फिर
    …. रात के स्याह अंधकार मे
    …. खो जाने के लिये।

    वह लडकी,
    जिसके जिस्म पर है;
    ……. पूरे दिन के जख्मों के निशान।

    …. .शायद,
    …. किसी चक्रव्यूह से बचकर
    … लौट रही है।,
    .. …. वह लडकी।

    .. . … जिसके चेहरे पर
    जीत की कोई खुशी नहीं…।।
    .. मन करता है,
    उसे रोक कर सवाल करुं.,
    क्यों इस तरह से आतीहै,
    ..अंधकार में खो जाने के लिये।
    . वह.लडकी-,
    चुप रहती है,
    …. हमेशा चुप रहती है लडकी,
    . शाम से अंधकार होने तक
    …. ..बस,
    ….. …. चुप रहती है।

    *महेश राजा*,
    वसंत 51,कालेज रोड
    ।महासमुंद
    छत्तीसगढ़।

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