Devendra Soni February 15, 2020

मुक्तक

अमर प्यार है माँ का जग में, माँ ही सच्चा मीत।
सेवा करता है जो माँ की, होती उसकी जीत।
नहीं हारता है वह जग में,माँ हो जिसके पास।
हर लेती है माँ सदैव दुःख, देती सुख सा शीत।।

चंचल सा यह बहे सहज मन, जैसे चले समीर।
अगर रखेगें मन काबू में, बन जाओगे पीर।
मोहित करती लाख वस्तुए, डगमग हो नहीं ध्यान।
शांत सदैव रखे इस मन को, जैसे नदियाँ नीर।।

दुर्गेश राव
भाटखेड़ी बुजुर्ग
तह. मनासा
जिला नीमच( मध्यप्रदेश)

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