Devendra Soni February 14, 2020

*ढ़ाई लफ़्ज़*

लफ्ज पूरे ढाई ही थे,
कभी प्यार बन गए तो कभी ख़्वाब
कद मे भी ढ़ाई ही थे,
जब तुम से टकराये थे,
उम्र रही होगी कोई सोलह बरस
जब तुमको समझ पाये थे,
कच्ची उम्र की वो अल्हड़ बातें
बात-बात में हकलाते थे,
दिल धड़का तो था शायद,
मगर हम कहाँ समझ पाये थे,
ना गर्मी के वो दिन थे ना सर्दी की रातें,
खुशनुमा बहार थी शायद,
पत्ते जो लहलाये थे,
उन पत्तों पर तुम्हारे कदमों की आहट
पीछे मुड़कर भी कहाँ देख पाये थे,
परिन्दों की चहचहाट में,
कोई गीत सुना था शायद,
एहसासों की जुगलबंदी में,
दो दिल धड़काये थे,
नज़रें मिला कर पलकें कहाँ झुकाये थे,
बिखरे बालों में भोले से तुम,
खिलखिला कर मुस्कुराये थे,
शरारती आँखों में बेशुमार प्यार लिए,
होले से गले लगाये थे,
लफ्ज़ तब भी ढ़ाई ही थे
कभी प्यार बन गये कभी ख़्वाब..!!

प्रियंका माथुर

14 thoughts on “नई दिल्ली से प्रियंका माथुर की रचना -ढ़ाई लफ़्ज़

  1. शुक्रिया युवा प्रवर्तक, मेरी कविता को प्रकाशित करने के लिए, कृपया पाठक भी अपनी राय दें,ताकि आवश्यक सुधार कर सके अपनी रचनाओं में । एक बार पुनः धन्यवाद

    1. खूबसूरत शब्द संजोयन और भावनायों का सटीक चित्रण ईश्वर आपकी लेखनी को ओर शक्ति प्रदान करे

  2. भावनाओं का सुंदर चित्रण ईश्वर आपकी लेखनी को ओर समृद्ध करे

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