Devendra Soni February 14, 2020

ढ़ाई आखर प्रेम के:महेश राजा

आज प्रेम दिवस है।बड़ी चर्चा है इसकी।परन्तु प्रेम तो ईश्वर प्रदत एक ऐसा उपहार है,जो हम सब जीवों को प्रदान किया गया है।प्रेम एक ऐसी आस्था है ,जो हम जीवों को ऊंचाई प्रदान करता है।

प्रेम किसी प्रकार का हो सकता है।माँ -बेटे का.पिता -पुत्री का.भाई- बहन का ,दो दोस्तो का या उन सबका जो अपने अंतःस्थल मे ह्रदय रखते है।

फिर स्त्री पुरूष के प्रेम को एक ही तुला से क्यों देखा जाता है।जो सिर्फ दैहिक है।यह अध्यात्मिक ,अलौकिक भी हो सकता है।कृष्ण-राधाजी का प्रेम इसका सटीक उदाहरण है।

आज के दिन के लिये अनेक बातें कही जा रही है।इसे माता- पिता दिवस या शहादत से जोड़ा जा रहा है।

यह पूर्ण मर्यादित एक दूसरे पर मर मिटने वाली भावना से ओतप्रोत शुद्ध प्यार क्यों नहीं हो सकता है।इसे सिर्फ वासना से जोड़कर, इस पवित्र शब्द का हम अपमान कर रहे है।

स्वनामधन्य बाबा मिड़िया से बडी बडी बाते,बडे बडे रेस्टिक्शन इस दिवस के लिये.ड़रा -धमका कर कर रहे है।जबकि स्वयं वे किन भोगों मे लिप्त है,यह जग जाहिर है।

हमे एक बात पर विचार करना होगा।प्यार जैसी अनुभूति कभी भी किसी के प्रति अनायास हो सकती है।इसे सकारात्मक रूप से देखना उचित होगा।

नाहक गलत प्रचार के द्बारा इस पवित्र भावना को दुषित करने का हमे कोई हक नहीं।

कबीर दासजी के शब्दों में “ढाई आखर प्रेम “का पढ़ लेना ही काफी है।

जीव जो मानवीय, इंसानी धर्म से जुडा है,उसे प्रेम करने का पूरा हक है।प्रेम सत्यं है.,शिवं है,सुंदरम है।

इसे पवित्र अर्थो मे लेना ही इसकी पूर्णता है।प्रेम जब तक जीवन मे रहेगा।यह प्रकृति,यह दुनिया हमेंशा खुशियों से परि पूर्ण रहेगी।दुःख या विकारो के लिये इसमे कोई जगह नहीं बच रहेगी।आमीन।

*महेश राजा*
वसंत 51,कालेज रोड ।
महासमुंद।छ.ग.

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