Devendra Soni January 14, 2020

ग़ज़ल

(1)
आज इंसा कोसता तकदीर क्यों?
चेहरों के हर अदा में पीर क्यों?
(2)
आँख की लाली झलकती आग सी,
छोड़ने को आमदा ये तीर क्यों?
(3)
देखते रहतें नजर खामोश हो,
बात करते हैं जुबां बेसीर क्यों?
(4)
क्या हुआ अंजान बन पूछें सभी,
आज हर सूरत लगे गंभीर क्यों?
(5)
राह भूला सा लगे हर आदमी,
बात में मिलती नहीं तासीर क्यों?
(6)
बाजुओं में जोर देखो हरतरफ,
हर किसीके हाँथ में शमशीर क्यों?
(7)
हो रहा उतपात कैसा आजकल,
कर रहें कुछ लोग हीं तकरीर क्यों?
(8)
याद कर वो दिन गुजारें थे कभी,
हमवतन चीखें कलेजा चीर क्यों?
(9)
हम किधर को जा रहें सोंचो जरा,
आज अनि भी बन गया रणधीर क्यों?

स्वरचित
अनिरुद्ध कुमार सिंह,
धनबाद, झारखंड

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