Devendra Soni January 14, 2020

सिगड़ी में रखी चाय

गली की
आखिरी मोड़ वाली पुलिया पर बैठकर
बहुत इंतजार किया
तुम नहीं आयीं
यहां तक तो ठीक था
पर तुम घर से निकली भी नहीं ?

मानता हूं
प्रेम दुनियां का सबसे
कठिन काम है

तुम अपने आलीशान मकान में
बैठी रही
मैं मुफ्त ही
अपनी टपरिया बैठे बैठे
बदनाम हो गया

बर्फीला आसमान
उतर रहा है छत पर
सोच रहा ह़ू
कि आयेंगे मेरे लंगोटिया यार
पूछने हालचाल

रख दी है
सिगड़ी पर
गुड़,सौंठ,तुलसी की चाय उबलने
यारों के ख्याल में ही डूबा रहा

हक़ के आंदोलन के लिए
लड़ने वाले
ईमानदार लड़ाकों को
भेज दिया गया है
हवालात में
जमानत लेने में
बह गया पसीना

सिगड़ी में रखी चाय
उफन कर बह रही है—-

“ज्योति खरे”
छिड़वाडा

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