Devendra Soni January 14, 2020

बन्धन रिश्तों का’ : समीक्षा

ई-पुस्तक : बन्धन रिश्तों का (कहानी संग्रह)
लेखिका : डॉ उपासना पाण्डेय
प्रकाशन : वर्जिन साहित्य पीठ
मूल्य : ₹१२५

जीवन क्या है? क्या आप सब ने इसके विषय में सोचा? मित्रों! जीवन की अनेक परिभाषाएंँ मिलती हैं यथा — जिन्दगी का चलायमान होना ही जीवन है , संघर्ष ही जीवन है, दायित्व निर्वहन ही जीवन है, जीवन आनन्द है इत्यादि। जीवन का जो रूप हमें जगत् में सर्वत्र परिलक्षित होता है वह है –संघर्ष ही जीवन है। जैसे जब एक नन्हा (नवजात) शिशु माता की प्रसवपीड़ा के साथ जन्म लेता है तब भी वह पैदा होने के लिए संघर्ष करता है। तदनन्तर जब वह स्तनपान करके अपने लिए दूध ढूँढ़ता है तब कुचतटों से दुग्ध पीना भी एक संघर्ष ही रहता है। इसी प्रकार वह अनवरत तीन वर्ष तक हिलना-डुलना, बैठना, खड़े होना, गिरना, चलना, हँसना, बोलना खेलना-कूदना, खाना-पीना, सबका प्रेम पाना सबमें संघर्ष ही करता है। हमें सहज प्रतीत होने वाली इन क्रियाओं के लिए भी नवजात को अथक संघर्ष करना पड़ता है। इसी क्रम में जब हम बड़े होते हैं तब शिक्षा के लिए संघर्ष, धनोपार्जन हेतु संघर्ष, अधिकार प्राप्ति हेतु संघर्ष, स्वास्थ्य हेतु संघर्ष, उदर पूर्ति हेतु संघर्ष, लालसा तृप्ति हेतु सर्वत्र संघर्ष ही करना पड़ता है। दु:खी मत होइए, इतने सारे संघर्ष हमारे समाज में होने वाले प्रतिदिन के संघर्ष हैं अथवा सामान्य व्यवहार, आप स्वयं निश्चित कीजिये।

डॉ० उपासना जी ने अपने इस कहानी संग्रह “बन्धन रिश्तों का” के माध्यम से समाज के विविध परिदृश्यों को उकेरने का एक सफल प्रयास किया है। इनकी कहानियाँ जहाँ वास्तविक समाज से अथवा वास्तविक जीवन से पूर्ण सरोकार रखती हैं वहीं कुछ कहानियाँ आदर्श मानव मूल्यों को आपके समक्ष प्रस्तुत करती हैं। इनकी “परवरिश” कहानी में अपने छोटे भाई को पढ़ाने-लिखाने और उसके उत्तम जीवन की कामना का जो आदर्श मिलता है वह अनुपम है किन्तु जब अपने भ्राता की मृत्यु के उपरान्त वह उसकी पुत्री को अपना नाम देता है तथा भाभी के साथ भाभी के रिश्ते का ही निर्वहन करता है। यह कहानी समाज में दृढ़ चरित्र एवं सहानुभूति की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करती है जिससे हमारी पीढ़ी को संस्कारों की दृढ़ता की शिक्षा मिलती है।

“सीख” कहानी के माध्यम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सम्बन्ध कितने भी प्रगाढ़ एवं खास क्यों न हो किन्तु हमें कभी भी अपनी चादर से पैर बाहर नहीं करने चाहिए। हमें सदैव अपनी क्षमताओं के अनुरूप ही सहायता करनी चाहिए नकि मनोभावों में बह कर के। हमें जोश में होश नहीं खोना चाहिए। यदि हम स्वयं सशक्त और सक्षम हैं तभी हमारा जीवन उपयोगी है अन्यथा सभी के लिए निरर्थक है। समाज में ऐसी समस्याएँ पहले कम थीं किन्तु आज इन स्थितियों का बाहुल्य दिखता है।

इनकी कुछ कहानियाँ “ललक”, “ संतुष्टि”, “एक मुट्ठी ग्लूकोज” आदि में समाज में उपस्थित गरीब श्रेणी के लोगों की समस्याओं, उनकी मन:स्थिति तथा उनके जीवन के अभावों की ओर हमारा मन मस्तिष्क ले जाती हैं। आज भी भारत में गरीबी, पुत्रमोह और बाल मजदूरी जैसी प्रथाएँ विभिन्न कानूनों के होते हुए भी समाज में व्याप्त हैं। जैसे – संतुष्टि कहानी में अनीता व सुनीता का पिता पुत्र की अपेक्षा रखता था। घर का पूरा दायित्व उसकी पत्नी ही सँभालती थी किन्तु रामधार का पुरुषत्व ही सर्वोपरि व्याप्त होता था जो हमारे पुरुष प्रधान समाज की ओर हमारा ध्यान ले जाती है। महिला कुछ भी कर ले किन्तु वर्चस्व पुरुषों का ही रहता है।

“एक मुट्ठी ग्लूकोज” की कहानी आज भी भारत के करोड़ों गरीब बच्चों की स्थिति की ओर इशारा करती है जो बिना दो वक्त की रोटी के भी पूरे दिन श्रम करने को मजबूर हैं। विभिन्न रैकेट्स इन बच्चों का शोषण करते हुए अपने कुत्सित व्यापार से धनोपार्जन करते हैं। आज भी बहुत सी छोटी एवं सामान्य सी वस्तुएँ भी सभी की पहुँच में नहीं हुआ करती हैं। इस बात को उपासना जी ने बड़े ही सहज ढंग से अभिव्यक्त किया है।

“ एक नई उड़ान “, मान्या आदि कहानियों में बच्चों की स्थिति को दर्शाया गया है कि परिवार वाले बच्चियों पर विवाह हेतु दबाव बनाते हैं जबकि वे अपनी एक पहचान बनाने हेतु लगातार घर, समाज और समस्या से जूझती मिलती हैं।

“भक्त वत्सला शीतला माता” में हमारी आस्था, विश्वास व धर्म की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। यह स्पष्टतया वर्णित है जैसे माँ शीतला ने सुशीला के बच्चों की चेचक के प्रकोप से तथा उसके देवरानी के पुत्र की सर्प दंश से रक्षा की। “अनोखा रिश्ता” हमारे उन प्रेम सम्बंधो को दिखाता है जो हमारे रक्त सम्बन्धों से भी अधिक प्रिय व गहरे हो जाते हैं। हमारे लिए हमारे जैसा ही सोचने की मन: स्थिति से हमारे सबसे करीब होने का हमें अनुभव कराते हैं।

हमारे पाठकगण एवं बच्चों के समक्ष ऐसी ही कहानियाँ प्रस्तुत होनी चाहिए जिससे कि उनमें संस्कार, धर्म, ईमानदारी, समर्पण, स्वावलम्बन, भक्ति, श्रद्धा जैसे गुणों का विकास हो सके। अपने सत् लक्ष्य को पूर्ण करने की दृढ़ता का भी संदेश हमें “बन्धन रिश्तों का” कहानी संग्रह से प्राप्त होता है।

मेरे मत में डा० उपासना पाण्डेय जी ने समाज के इन सन्दर्भों को बहुत ही मार्मिक एवं यथार्थ पूर्ण ढंग से अपनी कहानियों में प्रयुक्त किया है और उसके निर्वहन में इन्होंने पूरी सफलता पाई है। मैं डॉ० उपासना पाण्डेय जी को उनके लेखन हेतु अनेकानेक शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ जिससे वह भविष्य में भी अपनी संस्कारपरक कहानियों के माध्यम से समाज का दिशा निर्देशन कर सकें तथा एक जागरूक एवं जिम्मेदार नागरिक के कर्त्तव्य के अनुपालन में सक्षम हो सकें।

डॉ० ऋचा त्रिपाठी
बैंगलोर, कर्नाटक ।

1 thought on “बन्धन रिश्तों का , लेखिका : डॉ उपासना पाण्डेय : समीक्षा-डॉ० ऋचा त्रिपाठी

  1. सारगर्भित समीक्षा 👌👌👌👌
    हार्दिक धन्यवाद🙏💕 ऋचा जी

Leave a comment.

Your email address will not be published. Required fields are marked*