Devendra Soni December 10, 2019

ग़ज़ल
नजर ढूढते है

(1)
चुरा के नजर सब नजर ढूढते है।
लुटा के जिगर हम नजर ढ़ूढ़ते है।
(2)
बता दर्द अपना किसे जा सुनाये,
जमाना बुरा सब असर ढ़ूढ़ते है।
(3)
यहाँ बेवफाई करें है जमाना,
सभी को पता पर जहर ढ़ूढ़ते है।
(4)
बचाके छिपाके निगाहें चुराके,
धड़कते दिलोंका लहर ढ़ूढ़ते है।
(5)
लगाना बुझाना सदा मुस्कुराना,
तड़पते लबों पर कहर ढूंढते है।
(6)
बुरा है जमाना भलाई करें क्या,
मजा आरहा कह कगर ढ़ूढ़ते है।
(7)
बहुत हो गया अब हमें ना सताओ,
भटकते हुए ‘अनि’ सहर ढ़ूढ़ते है।

स्वरचित
अनिरुद्ध कुमार सिंह,
धनबाद, झारखंड।

2 thoughts on “धनबाद से अनिरुद्ध कुमार सिंह की ग़ज़ल

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