Devendra Soni December 3, 2019

ग़ज़ल

फिर लोगों से मिलना है कुछ मसले सुलझाने है।
फिर नींदे गिरवी रखनी हैं थोड़े से ख्वाब चुराने हैं।

रोज़ कमा कर भी यारों इतना अमीर हो न पाया,
मिटटी की गुल्लक में जोड़े जितने कभी ख़ज़ाने हैं।

कैसे न यूँ नींद सुकूँ की बच्चों को आ जाए भला,
बड़े बुजुर्गों की गोदी में किस्से बड़े सुहाने हैं।

भला भूलने की कोशिश कब न की मैंने लेकिन,
उस के पास याद आने के एक से एक बहाने हैं।

अपनी अपनी आदत है फिर मैंने माफ किया फिर वो,
बैठा बैठा सोच रहा कि क्या इलज़ाम लगाने हैं।

तूने तो बस एक पत्थर जैसे दरिया में फ़ेंक दिया,
अब कोशिश मैं करने बैठी कैसे दाग छुपाने हैं।

– डॉ.मीनाक्षी शर्मा,गाजियाबाद

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