पुस्तक समीक्षा- जलता हुआ पुल (काव्य संग्रह) लेखक/ कवि :अग्निशेखर । समीक्षक :डॉ. सुजाता मिश्र


पुस्तक समीक्षा
जलता हुआ पुल (काव्य संग्रह)
लेखक/ कवि :अग्निशेखर
समीक्षक :डॉ. सुजाता मिश्र
स्वतंत्र लेखक एवं समीक्षक
sujata0630@gmail.com

इस वर्ष अगस्त माह में जब केंद्र सरकार ने कश्मीर से अनुच्छे 370 हटाने का फैसला सुनाया तो पूरे देश में जैसे जश्न का माहौल था। लोगों की खुशी सांतवें आसमान में थी| अधिकांश लोगों के लिये यह राष्ट्र्भक्ति और मातृभूमि के सम्मान का विषय था, बहुत कम ही लोग समझ पा रहे थे कि यह हमारे कश्मीरी पंडितों के अस्तित्व से जुडा मामला था… जो 1990 के बाद वापस अपने घर – नगर ही न लौट सके, जिनकी एक पूरी नस्ल देश के विभिन्न भागों में बसे शरणार्थी शिविरों में जन्म लेने – पलने पर मज़बूर हुई…
“हॉं लौटने के लिये होता है घर
पर हमारे लौटने के रास्ते हैं बंद
जहां हुआ करते थे हमारे घर”

निर्वासन का दर्द बयां करती यह पंक्तियां महज़ एक कवि की आवाज़ नहीं हैं, यह तो पीडा है उस जनसमूह की जिसे 19 जनवरी 1990 की रात एकाएक बेघर – बेवतन कर दिया गया , महज़ एक सरकारी फरमान की आड में। कैसा होता होगा अपने ही घर से जान बचा के भागना ? कैसा होता होगा अपने ही वतन में “शरणार्थी” बनकर रह जाना? कैसा होता कभी वापस घर न सकने की पीडा? दुनिया – जहां के झमेलों – प्रपंचो से जूझता हर व्यक्ति शाम होते ही लौट आता है अपने घर। घर तो होता ही इसलिये है न कि वहाँ आकर इंसान भूल जाता है सब चिंतायें , परेशानियां , भय या झिझक । घर ही तो व्यक्ति में अपनेपन और आत्मविश्वास के बीज बोता है। यह भी विडंबना ही है कि भारत जैसे देश में जहां दुनिया के तमाम देशों से जान बचाकर – छुपछुपाकर लाखों लोग शरणार्थी बनकर बरसों से रह रहे हैं, वहीं इस धरती का स्वर्ग कहे जाने हमारें कश्मीर के रहवासियों को भी एक धर्म विशेष का होने के चलते शरणार्थी बना दिया जाता है! सोचती हूं जो देश दुनिया भर के दीन – दुखियों के लिये इतना उदार हो, वही देश अपने लोगों के कष्ट और पीडाओं प्रति इतना बेपरवाह क्यों बना रहा! “जलता हुआ पुल” एक सवालिया निशान छोड जाता है उन सरकारों पर जिन्होंने कश्मीरी पंडितों के निर्वासन को राजनीतिक एजेंडे की तरह चलाया, जो अपनें स्वार्थों में भूल गये मानवता के सामन्य मर्म भी! अग्निशेखर अपने संग्रह की ही अन्य कविता में ऐसे सभी लोगों पर कटाक्ष करते हैं
दूसरी वजहों से वे
मुंह नहीं खोलेंगे
वे मानते हैं हुई है ज्यादती
हमारे साथ
एके – 47 की नोक पर
छोडना पडा है घर और देश
पर वे नहीं बोल सकते
दूसरी वजहों से

संग्रह की शीर्षक कविता “जलता हुआ पुल” एक बेहद परिपक्व रचना है,आतंकियों द्वारा पुल का जलाया जाना महज एक सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाना नहीं होता , पुल को प्रतीक बनाकर कवि बहुत साफ – साफ शब्दों में कहते हैं कि आतंकियों के हमलें में नष्ट हुए पुल, स्कूल, कॉलेज या धार्मिक या ऐतिहासिक स्थल हमारें राजनेताओं और बुद्धिजीवियों की नज़र में महज़ एक आतंकी हमला हो सकते हैं ,किंतु वे वास्तव में पहचान है हमारे अस्तित्व की, हमारी संस्कृति की .. ऐसे आतंकी हमलों में अपना घर – परिवार गंवा चुके लोगों को सांत्वना देने के हमारे नेता कितनी आसानी से मुआवज़े की घोषणा कर देते हैं!किंतु वास्तव में आंतकी हमला होता है हमारे इतिहास पर जिसे मिटाकर वो अपना नया इतिहास लिखना चाहते हैं:-
पुल जल रहा था
अपने इतिहास के साथ
जिसके साथ चिढ थी उन्हें
जिसे बदलना चाह रहे थे वे।
एक पुल के जलने से जलती हैं
कितनी शताब्दियां !

संग्रह में छोटी – बडी कुल 53 कवितायें हैं, जिनमें से अधिकांश कविताओं में दर्द है निर्वासन का,पीडा है अपने अस्तित्व पर हुये हमले की , गुहार है समाज से की कोई कश्मीरी हिंदूओं के दर्द को भी समझे। गंगा – जमुनी तहज़ीब की कुछ दुहाई कश्मीरी हिंदूओ पर अत्याचार करने वालों के समक्ष भी दी जाये। सवाल है हमारे बुद्धिजीवियों , पत्रकारों, साहित्यकारों और फिल्म निर्माताओं से कि आखिर अपने ही देश में बेघर – शरणार्थी बना दिये गये कश्मीरी हिंदूओं का दर्द , उनकी रचनाओं , आंदोलनों या अभिव्यक्तियों का विषय क्यों न बन सका?
कवि सर्वानंद कौल तथा सत्रह साल के किशोर मुख्तार शेख की आतंकियों द्वार निर्मम हत्या पर लिखी कवितायें बेहद मार्मिक हैं , तो नौ बरस की किक बॉक्सर चैम्पीयन तज़मुल इस्लाम पर लिखी गयी कविता एक उम्मीद की किरण प्रतीत होती है। कुछ कवितायें कवि के साथी साहित्यकारों पर हैं, जो संस्मरण की तरह प्रतीत होती हैं। हालांकि कश्मीर से अब अनुच्छेद 370 हट चुका है, अब कश्मीर देश के अन्य राज्यों की तरह सबके साथ – मिलकर विकास की राह पर चलने को तैयार है , किंतु कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास का विषय अभी भी अधूरा है, लाखों कश्मीरी आज भी शरणार्थी कालोनियों में बेहद मुश्किल परिस्थितियों में जीवन जीने को विवश है, अपने अस्तित्व को बचायें रखने की जद्दोज़हद में , भविष्य से उम्मीद लगाये आज भी घर वापसी का इंतज़ार है उन्हें
ओ मातृभूमी।
तुम्हें चलते, फिरते जलावतनी में
नींद और सपनों में
सांस – सांस जीता हूं
करते हुए
तुम्हारी यादों को याद ।

डॉ. सुजाता मिश्र
स्वतंत्र लेखक एवं समीक्षक
sujata0630@gmail.com

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