जमशेदपुर से डॉ. प्रणय कुमार मिश्र की रचना -उसना भात

(मैंने एक दिन बाजार में एक बूढ़ी महिला को एक अखबार के पन्ने पर चार अधपके अमरूद बेचते हुए देखा। )

उसना भात

चार अमरूद बिक भी गये तो क्या,
नहीं बिके तो क्या?
बिक गये तो खा लेंगे …
उसना भात।
नहीं बिके तो,
यही खाकर सो जायेंगे,
पर
फिर कल आएंगे,
हो सकता मिल जाये, कल
उसना भात ।।

डॉ पी के मिश्रा
सर्जन
जमशेदपुर

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