महासमुंद से महेश राजा की लघुकथा-प्याज:एक चिंतन

प्याज:एक चिंतन

टिफीन बनाते हुए पत्नी कह रही थी-“पहले तो प्याज काटते समय आंसू निकल जाते थे।अब खरीदते वक्त निकल पडते है। रूचि पांव भाजी खाने की जिद कर रही है।बाजार जाती हूं, प्याज के दाम सुनकर हिम्मत नहीं पडती।गुणवता में भीअच्छे नहीं आ रहे प्याज।क्या होगा देश का?”

पतिदेव आज का अखबार पढ रहे थे_”क्या बताऊं,भागवान।आजकल अखबार पढते हुए डर लगता है।कोई भी अच्छी खबर नहीं।उपर से मंदी का दौर चल रहा है।दो माह से वेतन भी नहीं मिला।लोन भी सारे उठा चुका हूँ।”

पत्नी ने लंबी ऊंसास ली।पतिदेव आगे कह रहे थे,-“प्याज की ही बात कह ले,मध्यम वर्ग पहले एक किलो या आधा किलो खरीदते थे।अब ढाई सो ग्राम में ही संतोष कर लेते है।कैसे चलेगा यह सब।अब तो लगता है विवाह में सोने की बजाए प्याज की बोरी मांगने लगेंगे और लाकर में भी प्याज सहेज कर रखेंगें।”-एक खोखली हंसी के साथ वे उठे।आफिस के लिये देर हो रही थी।जाते समय फिर बोले-“पहले प्याज आम लोगों के खाने की चीज थी।अब यह खोने की वस्तु हो गयी है।क ई लोगों के तख्त पलट दिये इसनै।महंगाई, भूखमरी,बेरोजगारी के साथ अब प्याज भी गंभीर समस्या बन गयी है।शायद इसे ही जीवन कहते है।चलो ।ठीक है ,हो ही वही जो राम रची ।रखा।”

पत्नी सोच रही थी आज फिर बिटिया पावभाजी के लिये जिद करेगी और उसे मायूस होना पडेगा।

*महेश राजा*,
वसंत 51,कालेज रोड।
महासमुंद।छ.ग.

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