बदायूं से रंजना शर्मा की रचना -जो तुम सच ये कह पाते

जो तुम सच ये कह पाते

द्रवित नहीं ये दृग होते,
जो तुम सच ही कहा पाते।
ह्रदय बहुत आभारी होता
और सबकुछ हम सब जाते।।

मिथ्या लगता आडम्बर सारा,
जीवन बेदर्दी इन राहों में ।
खुलकर काश बिखर पाता ,
ये उपवन तेरी बाहों में ।।
स्वयं किया वादा स्वयं आकर आज निभा जाते ।।
ह्रदय…….

अपने अपनों में भेद किया ।
कहने को अपने पर सन्देह
किया ।।
बर्षों प्यासी जीवन हाला को
हमने फिर एक साथ पिया ।
कुछ बूंदें अमृतरस जीवन में छलका जाते ।।
ह्रदय…..

कोई ऐसी डोर नहीं जो
बांधे रिश्तों की इस डोरी को ।
छिपा नहीं पाये जाने क्यो
मन की उस कमजोरी को।।
बिसराकर उन यादों को चिता काश सजा पाते ।।
ह्रदय…
क्षणभंगुर जीवन में साथी
कितना हमको पहचान सके।
स्वजनों की पंक्ति में लाकर भी,
क्यों न अपना फिर मान सके
घावों की परतें नोच देखते रहे सदा ही मुस्काते ।
ह्रदय….

सर्वाधिकार सुरक्षित
स्वरचित
रंजना शर्मा,बदायूं

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