धनबाद से अनिरुद्ध सिंह की रचना – प्रेम

प्रेम

यह प्रेम निहित संसार बना,
यौवन जीवन का हार बना।
सब जीते हैं जीवन अपना,
ये प्रेम जगत का है सपना।।

यह प्रेम बड़ा ही मतवाला,
विचरे निर्भेद गोरा काला।
जिस तन में ये रस धार बहे,
वो सागर सा मचले छलके।।

यह प्रेम जगत उद्धार करें,
मिल जीवन नैया पार करें।
इसके दमखम मन रास करें,
इक डोर बंध परिहास करें।।

यह प्रेम सदा इक प्यास बनीं,
हर जीवन में इक आस बनीं।
नव रूप धरे लटके झटके,
यह खेल करे सबसे हटके।।

यह प्रेम बड़ा मनभावन है,
यह प्रेम जगत मनमोहन है।
हर दिल करता नित वंदन है,
जीवन जीवन अभिनंदन है।।

पूर्णतः स्वरचित व स्वप्रमाणित

अनिरुद्ध कुमार सिंह,
सिंदरी, धनबाद, झारखंड।

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