समन्वय के शिक्षक प्रो. इन्द्रमोहन सिंह- संस्मरण आलेख – डॉ. नौनिहाल गौतम

*समन्वय के शिक्षक प्रो. इन्द्रमोहन सिंह*

वाडिया हॉल में चल रहे पुनश्चर्या पाठ्यक्रम में मैं व्यस्त था। इसी दौरान मोबाईल पर एक वाट्स-एप मैसेज देखा, जो श्री गोपी शर्मा ने भेजा था। सन्देश था- ‘बड़े दुःखी हृदय से सब मित्रों व संस्कृतज्ञों को सूचित कर रहा हूँ कि पंजाब के जाने माने प्रसिद्ध साहित्य शिरोमणि प्रोफेसर डॉ. इन्द्रमोहन जी का आज दिनांक 8.11.19 को स्वर्गवास हो गया है। अंतिम संस्कार पटियाला में ही शाम 4 बजे होगा। अंतिम दर्शन उनके घर पटियाला में होंगे। भगवान ऐसे संस्कृत सेवकों को बार बार मार्गदर्शक के रूप में भेजता रहे।’ इसे पढ़कर मेरे मुँह से अचानक निकल पड़ा-‘ओह्ह हे भगवान!!!’ यह बात 08 नवम्बर को प्रातः काल की है। यद्यपि मैं गोपी शर्मा जी को जानता हूँ। वे प्रो. इन्द्रमोहन सिंह जी के करीबी शिष्यों में से हैं। इसलिए उनके संदेश पर सन्देह नहीं होना चाहिए था, पर चाह रहती है कि काश! प्रियजनों के चिरवियोग की खबरें झूठी हों। ऐसा कैसे हो सकता है कि जिनको इसी कार्यक्रम में आमंत्रित करना चाह रहे थे, वे ही हमें छोड़कर . . . नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, ऐसा न हो। इसी डूबते उतराते विश्वास के साथ मैंने फोन किया डॉ. पुष्पेन्द्र जोशी जी को, जो मेरी पटियाला यात्रा के दौरान अच्छे परिचित हो गये हैं। मैं सीधे-सीधे पूछने की हिम्मत न जुटा सका, पर उन्होंने इस दुःखद सूचना की पुष्टि की। डॉ. रामकुमार मुखोपाध्याय के ‘बंगाली उपन्यास’ पर गंभीर वक्तव्य का समय किसी तरह बीता तो मैंने विभागीय जनों व परिचितों को यह दुःखद सूचना दी। सभी ने इस पर आश्चर्य व गहरा दुःख व्यक्त किया।

उपर्युक्त वाडिया हॉल डॉ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय सागर (म.प्र.) का एक सेमिनार हॉल है। इसी में 27-28 फरवरी 2014 को प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी की सेवानिवृत्ति पर सौप्रस्थानिक समारोह हुआ था जिसने राष्ट्रीय संगोष्ठी का आकार ले लिया था। इसमें प्रो. इन्द्रमोहन सिंह जी भी आए थे। ‘भी’ इसलिए क्योंकि इसमें प्रो. सिंह की तरह आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी की शिष्यपरम्परा पधारी थी। प्रो. सिंह अपने पुराने-नए, परिचित-अपरिचित सागरीय जनों से दोनों दिन मिलते-जुलते रहे। पहले दिन विधिवत् शोधपत्रों का वाचन हुआ किन्तु दूसरे दिन विदाई समारोह का प्रभाव क्रमशः बढ़ता गया था। सब अपने-अपने भाव व्यक्त करते जाते थे। संगोष्ठी के समापन समारोह में प्रो. सिंह अध्यक्ष के रूप में मंच पर आसीन थे। जब उनका क्रम आया तो शाम के लगभग 6 बज चुके थे। वे बोल ही रहे थे कि बीच में ही आवागमन की व्यवस्था में लगे शोधार्थी ने पर्ची पर लिख कर दिया कि ‘ट्रेन का समय हो रहा है, जल्दी करें।’ उनके पास सागर की स्मृतियाँ थीं सागर सी असीम-अपार, व्यक्त करने की समय सीमा थी- अँजुरी की भाँति नितान्त सीमित। फिर भी वे मधुर स्मृतियों से सबको सींचते जा रहे थे अविरत-अविरल। उन्होंने आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी जी की विवाह पूर्व की कठिन दिनचर्या और रहन-सहन का जो वर्णन किया था उसे सुनकर सारी सभा कौतूहल से भरी उन्हें देखती रह गयी, मानो एक पुराने युग का साक्षात्कार कर रही हो। संयोग से इस वर्णन के समय प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी के साथ उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सत्यवती त्रिपाठी भी हॉल में मौजूद थीं। छात्रजीवन में प्रो. सिंह की वरिष्ठ रहीं प्रो. कुसुम भूरिया वहाँ थीं तो उनके कनिष्ठ छात्र रहे प्रो. ओमप्रकाश राजपाली जी व अन्य भी। उनकी उदारता वर्णन शैली में भी झलकती थी। वे भावों से भरे हुए थे और स्मृतियों को शब्दों में ढालते जा रहे थे। बीच-बीच में ट्रेन के समय की सूचना हेतु पर्चियाँ उन्हें दी जा रही थीं। वे सागर विश्वविद्यालय की उस विशाल परम्परा से परिचित थे जिनमें विश्वविद्यालय के संस्थापक द्वारा नियुक्त प्रो. रामजी उपाध्याय और डॉ. वनमाला भवालकर जैसे नाम हैं। उपाध्याय जी उनके शोध निर्देशक रहे थे। ‘भास के रूपकों का नाट्यशास्त्रीय अध्ययन’ विषय पर 1978 में उन्होंने शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया था जो सागर विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में आज भी शोधार्थियों को आकर्षित करता है। अपने वक्तव्य में वे बता रहे थे कि दुरूह विषयों को पढ़ने के लिए वे अपने शिक्षकों के आवासों पर चले जाया करते थे। विद्यार्थी दिनों में अपने सहपाठी जी. एस. कुडवेती से प्रतिस्पर्धा ने उन्हें अधिक अध्ययन हेतु प्रेरित किया था। घड़ी में सात बजने जा रहे थे तो वह शोधार्थी स्वयं आकर कान में बुदबुदाया- ‘सर! नीचे कार स्टार्ट खड़ी है आपको स्टेशन ले चलने के लिए, चलिए, नहीं तो ट्रेन छूट जाएगी।’ यादों के सागर को गागर में समेट रहे प्रो. सिंह से इस बार न रहा गया तो उन्होंने कह दिया कि-‘अरे! छूट जाने दो ट्रेन को, किसी तरह चला जाऊँगा, पर बात तो पूरी करूँगा।’ सारा वाडिया हॉल उनके प्रति आभार से भर गया। लोगों की भावनाओं को शब्द दिये मंच पर बैठे स्वयं प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने, यह कहते हुए कि -‘कोई सरदार ही ऐसा कर सकता है’। उन्होंने अपनी बात पूर्ण की क्योंकि ‘पूर्णता गौरवाय’, और गौरव के लिए सरदारों का त्याग और बलिदान सर्वदा प्रणम्य है। उनका वक्तव्य पूर्ण होते ही सारा हॉल बड़ी देर तक तालियों से गूँजता रहा। यहाँ से उन्हें सीधे स्टेशन पहुँचाया गया, जहाँ अपने स्वभावानुसार लेट आयी ट्रेन उन्हें मिल गयी और वे सुखद स्मृतियों में इजाफा कर सागर से विदा हुए थे। उन्होंने अपने सौजन्य के स्नेहसिक्त तन्तुओं से हमें जोड़ लिया था।

महर्षि वाल्मीकि पीठ के अध्यक्ष के नाते वे मार्च 2016 में एक संगोष्ठी करवा रहे थे ‘इसमें आना है’ ऐसा उन्होंने कहा। ‘आना है’ यह सूचना थी या आदेश, सलाह थी या आग्रह, अनुरोध या कुछ और . . . इसका मुझे भान नहीं, ‘जाना है’ यह सहर्ष स्वकृति मेरे मन ने दी थी। पटियाला जाकर प्रत्यक्ष किया कि उनका मन भी तो ‘पटियाला हाऊस’ जैसा था, विशाल और सबका स्वागत करता हुआ। उनके शिष्य संगोष्ठी की व्यवस्थाओं में तन-मन से जुटे हुए थे। उस संगोष्ठी में दिल्ली वि.वि. के प्रो. रमेश भारद्वाज, चंडीगढ़ के प्रो. वीरेन्द्र अलंकार, कुरुक्षेत्र वि.वि. के प्रो. भीम सिंह, नाभा से आये श्री निगम स्वरूप शास्त्री इत्यादि थे। आर्यसमाज, महर्षि वाल्मीकि, सनातन और सिख परम्पराओं के ज्ञाता उनके सौजन्य से वहाँ पधारे थे। प्रायः सभी उनके लिए महात्मा, संतपुरुष, सज्जन जैसे सम्बोधन करते थे। उनके सौजन्य से हुई इस यात्रा में मैंने स्वर्णमंदिर, अमृतसर दर्शन की लालसा भी पूरी कर ली थी।

पुण्यभूमि अमृतसर में ही 19.07.1951 को प्रो. सिंह का जन्म हुआ था। सेना में सूबेदार श्री चरणसिंह जी और श्रीमती कृपा कौर की चार सन्तान में वे सबसे छोटे थे। सिकंदराबाद से मैट्रिक पास कर वे बालाघाट अपने दादा के पास आ गये थे। वहाँ स्नातक उत्तीर्ण होने पर प्राचार्य ने उन्हें उच्च शिक्षा हेतु सागर विश्वविद्यालय जाने की सलाह दी थी। इस तरह वे उस सागर में आ पहुँचे थे जो अंत तक उनके मन को मोहता रहा। सागर में रहकर उन्होंने नाट्य और नाट्यशास्त्र का विशेष अध्ययन किया, वहीं महर्षि वाल्मीकि पीठ के अध्यक्ष के नाते महर्षि वाल्मीकि को पढ़ा, सुना, गुना, जाना, समझा और समझाया। महर्षि वाल्मीकि को जन-जन तक पहुँचाने की उनकी विस्तृत योजना थी। संगोष्ठी, शोधपत्रों का पुस्तकाकार प्रकाशन, मौलिक साहित्य की रचना, नाट्य-मंचन आदि माध्यमों से लोग महर्षि वाल्मीकि को जान सकें, यह उनकी चाह थी। वे कुन्दमाला नाटक का मंचन करवाना चाहते थे। इस हेतु उनके कहने पर मैंने श्री संजीव घारू को वीडियो भेजा था जिसमें मैंने स्मरणीय डॉ. कमल वासिष्ठ (ग्वालियर) के निर्देशन में लक्ष्मण की भूमिका निभायी थी। सम्भवतः प्रो. सिंह के अनुरोध पर ही प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने वाल्मीकिचरितमहाकाव्यम् की रचना की है। महर्षि वाल्मीकि जैसी उदारता के साथ दृढ़ता भी थी उनमें। साहित्य अकादमी द्वारा 29.11.2016 को दिल्ली में आयोजित परिसंवाद में मैंने शम्बूकप्रसंग से संबंधित विचार रखे। बाद में उन्होंने मेरी प्रस्तुति को तो सराहा किन्तु स्पष्ट रूप से ‘शम्बूककथा’ को रामायण का प्रक्षिप्त अंश बताया। उसी वर्ष दिल्ली संस्कृत अकादमी की संगोष्ठी में मैंने उनकी श्रीमद्भगवद्गीता पर गम्भीर चर्चा सुनी थी।

प्रो. सिंह के सागर निवासी मित्र डॉ. रामरतन पाण्डेय की पुत्री पटियाला में स्टेट बैंक में हिन्दी अधिकारी थीं। उससे मिलने पाण्डेय जी जाते तो वहीं दोनों मित्रों की मुलाकातें हो जाया करती थीं। वे सागर का हाल चाल जरूर पूछते और पाण्डेय जी सागर आकर उनका कुशल क्षेम बतलाया करते थे। पाण्डेय जी ने अपनी काव्यकृति ‘एकाकी पथिक’ में प्रो. सिंह को अपनी काव्य रचना का प्रेरणास्रोत बतलाया है। छात्रजीवन में उनकी एक कविता कॉलेज की वार्षिक पत्रिका में छपी थी जिसके नीचे प्राचार्य की टिप्पणी थी- ‘लगता है जयशंकर प्रसाद का अवतरण फिर से हो चुका है।’

सागर से जाने के बाद उन्हें सागर में आमंत्रित तो अतिथियों की भाँति ही किया जाता था किन्तु सागर आकर वे अतिथि के बजाय आतिथेय की भूमिका निभाने लगते। बाहर से आये अतिथियों को सुविधा पहले उपलब्ध करवाना, सागर के बारे में, विभाग के स्वर्णिम इतिहास के बारे में बताना, गुरुजनों का गुणगान करना- जैसे वे अपना कर्तव्य मानते थे। वे यहाँ आये अपने पुराने मित्रों के साथ निःसंकोच गलबहियाँ डाले बैठे, बतियाते देखे जा सकते थे। उनके कुछ शिष्य मुझे हरिद्वार में एक संगोष्ठी में मिले। उन्होंने कम से कम एक बार सागर आने की जो लालसा प्रकट की उससे मैंने जाना कि वे पटियाला में अपने विद्यार्थियों के बीच सागर की महिमा गाते रहे होंगे।

सागर विश्वविद्यालय का संस्कृत विभाग अपनी संगोष्ठियों के लिए जाना जाता है। विश्वविद्यालय के भाषा संकाय में पहली अन्ताराष्ट्रिय संगोष्ठी संस्कृत विभाग में मार्च 2018 में हुई थी। इसमें प्रो. सिंह आमन्त्रित विद्वान् थे। एक सत्र की अध्यक्षता भी उन्होंने की थी। ‘पंजाब में संस्कृत’ विषय पर अपने व्याख्यान में उन्होंने संस्कृत को पंजाब के महत्त्वपूर्ण योगदान तथा वर्तमान में पंजाब में संस्कृत की चिन्तनीय दशा का निरूपण किया था। सागर में संगोष्ठियों के दौरान ‘सान्ध्य कार्यक्रम’ विशेष आकर्षण का केन्द्र हुआ करते हैं। इनमें कभी नाटक, कविसमवाय, शास्त्रचर्चा होते हैं तो कभी विद्वान् के रूप में आमंत्रित पूर्व छात्र रोचक स्मृतियाँ सुनाते हैं। ये गतिविधियाँ अध्ययनरत छात्रों में संस्था के प्रति लगाव और अपने अग्रजों के प्रति आत्मीयता पनपाती हैं। इन गतिविधयों के प्रो. सिंह अभिन्न अंग रहे। छात्रजीवन में उन्होंने कई नाटकों में अभिनय किया जो सागरीयों की स्मृतियों में अंकित है। इस संगोष्ठी में एक शाम विभाग के पूर्व छात्र डॉ. संजय द्विवेदी द्वारा स्थापित विश्व के प्रथम संस्कृत बैण्ड ‘ध्रुवा’ की मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुति हुई थी। एक संध्या में संस्कृतकविसमवाय का आयोजन हुआ जिसमें प्रो. सिंह ने काव्यपाठ किया था। इससे पहले गुरु प्रो. रामजी उपाध्याय पर उनकी श्लोकात्मक श्रद्धांजलि ‘मम गुरुवर्याः’ पढ़ने में आयी थी। उनकी रचना ‘महर्षिवाल्मीकिशतनामस्तोत्रम्’ पर मेरी समीक्षा सागरिका में छपी है। उन्होंने अपनी ‘बुधशतकम्’ कृति मुझे सप्रेम भेंट की थी, लिखा था- ‘तेजस्वी विद्वान् डा. नौनिहाल गौतम के लिए . . . ’। यह उनका आशीर्वाद ही है मेरे लिए। इस पुस्तक के उद्घाटन पृष्ठ पर लिखी रामायण की सूक्ति उनके जीवन-दर्शन की ओर संकेत करती है- ‘कर्मभूमिमिमां प्राप्य कर्तव्यं कर्म यच्छुभम्।’ अर्थात् इस कर्मभूमि को पाकर जो शुभ कर्म हो, वह करना चाहिए। यही तो जीवन भर करते रहे थे वे।

वे दूर थे संकीर्ण विचारों, भेदक-वादों और विवादों से। सौजन्य उनके स्वभाव में था और शिक्षण उनकी वृत्ति थी। उनकी मातृभाषा पंजाबी थी, संस्कृत के वे शिक्षक थे, हम लोगों से हिन्दी में बात करते और अंग्रेजी भी उन्होंने सागर विश्वविद्यालय के छात्रावास में रहते समय साथी शोधार्थी से सीख ली थी। प्रोफेसरशिप के साक्षात्कार के दौरान विशेषज्ञ के अंग्रेजी में किये गये प्रश्नों के उत्तर उन्होंने अंग्रेजी में ही दिये थे। भाषाएं सार्वजनीन हुआ करती हैं, इसके वे प्रत्यक्ष उदाहरण थे। हालाकि शुरुआत में लोग उन्हें देखकर चौंक जाते थे कि ‘सरदार और संस्कृत’, किन्तु अपनी योग्यता से वे ‘संस्कृत के सरदार’ साबित हुए। उनके गुरु उपाध्याय जी उन्हें ‘पण्डित’ कहकर संबोधित करते थे। संस्कृत जगत् से उन्हें भरपूर प्रेम और सम्मान मिला। वे जानते थे कि ‘विस्तार ही जीवन है और संकोच ही मृत्यु।’

उनकी विषय निरूपण की शैली भाषणकर्ता के बजाय शिक्षक की हुआ करती थी। अनौपचारिक वार्तालाप में भी वे एक शिक्षक की भाँति समझाते थे। यही कारण है कि उनके शिष्य उन्हें असीमित आदर और सम्मान देते रहे और वे भी अपने शिष्यों पर अपना वात्सल्य लुटाते रहे। उनमें पंजाबी ‘टौर’ तो थी किन्तु ‘ठसक’ नहीं थी जो कि बड़े पदों पर रहने पर प्रायः आ जाया करती है। वे ‘इन्द्र’ होकर भी ‘मोहन’ बने रहे। बनावटी सजावटीपन उन में न था। इसीलिए कभी-कभी वे अस्तव्यस्त भी दिखाई पड़ जाते थे। उनकी सहजता का दायरा निश्चिन्तता तक चला जाता था। उनके निश्चिंत स्वभाव ने उनको शरीर की सुरक्षा के प्रति अधिक सचेत न रहने दिया। आज की जानलेवा बीमारियाँ अच्छे-बुरे में भेद कहाँ करती हैं? और अनपेक्षित दुःखद घट गया। घातक बीमारी ने एक निर्मल मानस जन हम से छीन लिया। इससे संस्कृत जगत् की तो कई मायनों में हानि हुई ही समाज ने भी ऐसा व्यक्ति खो दिया जो भाषावाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद जैसी खाईयों के बीच एक सम्बन्ध सेतु था जिसके समन्वय ने परम्पराओं में मेलजोल बढ़ाया था। सागर विश्वविद्यालय ने अपना आत्मीय पूर्व छात्र खोया तो पटियाला के विद्यार्थियों ने ऐसे शिक्षक को खोया जो उनके लिए सुख का स्रोत और दुःख में आश्रय था। उनके विद्यार्थी डॉ. आशीष संधीर, ओमनदीप शर्मा, गोपी शर्मा, कपिल देव इत्यादि उनकी प्रशंसा करते नहीं अघाते, उनकी गुरु के प्रति असीम श्रद्धा देखते ही बनती है। प्रो. सिंह की शोक पत्रिका पर दुःखी हृदय में एक ओर उनके परिवार जनों के नाम थे तो दूसरी ओर ‘सभी मित्र तथा शिष्यगण’ लिखा था। हँसमुख और प्रसन्नचित्त रहने वाले प्रो. सिंह ने अपनी मृत्यु के अतिरिक्त अन्य अवसर पर शायद ही किसी को दुःखी किया हो!। शिष्यों की ओर से यह श्लोक लिखा गया था-
गुरौ न प्राप्यते यत्तन्नान्यत्रापि हि लभ्यते।
गुरुप्रसादात् सर्वं तु प्राप्नोत्येव न संशयः।।

पंजाबी विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में शिक्षक डॉ. पुष्पेन्द्र जोशी और डॉ. वीरेन्द्र शर्मा उनकी परंपरा को नयी ऊँचाईयाँ देंगे, ऐसी उन्हें अपेक्षा थी। हमें भी आशा है बन्धु! कि सागर से उनके प्रेमपूर्णसम्बन्ध को आप बनाए रखेंगे।

‘समकालीन भारतीय साहित्य’ पर हुए पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का उद्घाटन प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने किया था। इसमें संस्कृत-पंजाबी-हिन्दी-अंग्रेजी के ज्ञाता प्रो. इन्द्रमोहन सिंह जी को आना था, वे न आये, आयी तो उनके पूर्णतत्त्व में विलीन होने की सूचना। उसी वाडिया हॉल में जहाँ कभी उन्होंने अपना वक्तव्य पूर्ण करके ही विराम लिया था। हम सब उनसे गुरुता, सहजता-सरलता, सौजन्य, सामंजस्य, समन्वय की सीख लें, यही उनके प्रति सही मायनों में श्रद्धांजलि होगी। बिना किसी लाग लपेट के, औपचारिकताओं से परे कही गयी लोकहित साधने वाली उनकी बातों को हमेशा यादों में सँजोये रखेंगे हम सब और ऐसे कई वाडिया हॉल।

।।जो बोले सो निहाल . . . सत् श्री अकाल।।

डॉ. नौनिहाल गौतम
संस्कृतविभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,
सागर (म.प्र.) 470003
मो.- 09826151335, ईमेल
dr.naunihal@gmail.com

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