Devendra Soni December 2, 2019

कब तक सहेंगी बेटियां

निर्भया,ट्विंकल,प्रियंका जाने हैं कितने ही नाम।
इन सभी मासूम ने क्यों पाया इक जैसा अंजाम।
भेड़िये वहशी बुझा कर प्यास अपने हवस की –
कत्ल करके घूमते हैं शान से सब खुल्लेआम।

क्यों चरम पर आजकल है ज़ुल्म इतना आसपास।
क्यों छुअन अनचाही सहती बेटियां होकर उदास।
सह रही क्यों वेदना सदियों से हर नारी यहां –
क्या यही रीती करेगी स्वस्थ भारत का विकास।

कबतलक जाएगी लिक्खी ख़ूनी स्याही से किताब।
कब लिया जाएगा दुष्कर्मी से अस्मत का हिसाब।
बेटियां ही दुःख भी सहतीं ताने सहतीं बेटियां –
और मरे शर्मिंदगी से डाल कर मुंह पर नक़ाब।

खूब होता शोर चारों ओर कुछ होता है जब।
जागती है चेतना हूंकार सब भरते हैं तब।
चार दिन होती है चर्चा और निकलता है जुलूस –
और जला कर मोमबत्ती घर चले जाते हैं सब।

लगता है न तंत्र है ना देश में क़ानून है।
हर घड़ी होता यकीं, इन्सानियत का ख़ून है।
कठघरे में है खड़ा ख़ुद न्याय आंखें मूंद कर –
हैवानियत कानून से भी ज्यादा अफलातून है।

रिपुदमन झा “पिनाकी”
धनबाद (झारखण्ड)
स्वरचित

1 thought on “धनबाद से रिपुदमन झा पिनाकी की अभिव्यक्ति-कब तक सहेंगी बेटियां

  1. मेरी रचना को प्रकाशित करने के लिए आदरणीय श्री देवेन्द्र सोनी जी तथा युवा प्रवर्त्तक का हृदयतल से आभार अभिनंदन धन्यवाद 🙏

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