Devendra Soni November 12, 2019

तुम्हारी यादें

खामोश नही
रहने देती
शोर बड़ा
मचाती हैं
जबरदस्ती मुझसे
बाते करती हैं

तुम्हारी यादें

तुमसे मिली हूँ
जबसे
कुछ खिलने लगा
मन में
ये क्या सींचने लगी
बंजर मन में

तुम्हारी बातें

एहसासों का
रेशमी धागा
एक सिरा लिए
जिसका
फिरती थी तन्हा
दूसरे सिरे को
थामकर
बांधती है मुझको

तुम्हारे वादें

डरती हूँ बहुत
खोने से तुम्हे
लड़ती हूँ बहुत
हकीकत से अपने
कहीं हथेली से
रेत जैसी फिसल ना जाएँ

तुम्हारी यादें

सविता दास सवि
तेज़पुर ,असम

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