Devendra Soni November 12, 2019

कलंक

धन्यवाद मेरे लाल
मेरी कोख से जन्मे
अहो भाग्य मेरे
पाप विहीन हुई मैं
तुम बिन बंजर कह
चीर दी छाती
निशब्द मैं न जान सकी
अपराध मेरा
सूनी गोद सूनी आंखें
पर कानों में कोलाहल
मस्तक की फटती नसें
असहनीय धमक से
दर दर भटकी
कोई कमी नहीं
फिर किस बात से
छलनी किया हृदय
अज्ञात रहा
अनुभूति नहीं
मेरी पीड़ा की
बस आनंद लिया
शब्द वाण भेद के
इस तरह समाज के
कुलीन समझाते रहे मुझे
मैं जान न सकी
सम्भालूं अपना मन
या तन
कहां ढूंढू हत सम्मान
जो अपनों ने
गिरा के कुचल के
फेंक दिया
आत्मा के आगे
तुम ना आते
तो मृत हो जाता
मेरा स्त्रीत्व
क्योंकि नहीं है
उपयोगिता
चाहे कुछ दें परिवार
या समाज को
उत्पादकता से भरें हों
कितना भी
मगर जननी न बन सकी
तो कलंक है
यह जन्म स्त्री का।

दीप्ति सक्सेना
जवाहरपुरी, बदायूं।

6 thoughts on “बदायूं से दीप्ति सक्सेना की रचना – कलंक

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