अच्छा किया जो डिबिया पापा को दे दी, वो ज्यादा थोड़े जिएंगे : पत्रकार गाँधी की यात्राओं के प्रेरक किस्से

पिछले दिनों एक शोक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए इटारसी से कोटा जाना पड़ा। उस दिन इटारसी से कोटा जाने के लिए संयोगवश रात सवा आठ बजे की एक ट्रेन मिल गई और स्लीपर कोच में एक बर्थ भी मिल गई। वहाँ एक परिवार के बहुत सारे लोग बैठे थे उन्होंने मेरी बर्थ की जगह दूसरे कोच में उनकी एक बर्थ डे दी। इस सीट पर जो वाक़या हुआ वो मेरे लिए सक्सेस स्टोरी बन गई। इससे पहले भी एक वाक़या दिल्ली से इटारसी लौटते समय हुआ था जिसे इस अनुक्रम में पहली सक्सेस स्टोरी इस कोटा यात्रा के बाद कह सकता हूँ।
जिले की तंबाखू निषेध समिति का सदस्य होने के कारण और तंबाखू से अपनी नफ़रत के कारण लोगों को तंबाखू सिगरेट छोड़ने के लिए कहना और ज़्यादा अच्छा लगने लगा। एक दोस्त की बीस साल पुरानी आदत छुड़वाने और दूसरे कई दोस्तों को कम करने पर मजबूर कर दिया। कुछ हठी हैं लेकिन अब सामने सेवन करने से बचते हैं। लेकिन जो दो वाकये जिनका ज़िक्र सक्सेस स्टोरी के रूप में कर रहा हूँ वो शायद औरों के काम भी आ जाए।
सो कोटा यात्रा के दौरान एक चौदह पंद्रह बरस का एक लड़का अच्छे ड्रेसअप में साइड लोअर बर्थ पर आकर बैठ गया, उसकी साइड अपर बर्थ थी। और एक यात्री हबीबगंज स्टेशन से जयपुर जाने के लिए सामने आकर बैठ गया। भोपाल स्टेशन आते आते लड़का थोड़ी देर के लिए किसी के पास गया और लौटा तब उसके हाथ में तंबाखू की तैयार पुड़िया थी। उसके हाथ में पुडि़या पर जयपुर जा रहे व्यक्ति की नज़र पड़ गई बस फिर क्या उसने लड़के की ओर अजीब तरह से देखना शुरू कर दिया। जैसे ही ट्रेन भोपाल से छूटी एक मामूली से हुए झटके के कारण लड़के के हाथ से पुड़िया नीचे गिर गई और बरसात के कारण यात्रियों के जूते चप्पलों से गीले फ्लोर पर गिरते ही तम्बाखू खराब हो गया। बस फिर क्या था जयपुर जाने वाले आदमी का चेहरा खिल गया और लड़के से तुरंत बोला तुझे पता है तेरा तम्बाखू क्यों गिर गया। लड़के को अंदाज नहीं था कि कोई अचानक उससे बात शुरू कर देगा और वो भी ऐसे। लड़के में रुचि उसके प्रश्न पर उठना लाज़मी था इसलिए उसने जवाब में नहीं कह दिया। अब मैं भीइस वाकये से पूरी तरह से जुड़ गया था, क्योंकि बात तम्बाखू और लड़के के बीच संबंध तोड़ने की थी। इस जवाब को सुनकर उस व्यक्ति ने बात आगे बढ़ाई और उससे उसकी यात्रा की जानकारी पूछी, लड़के ने नागपुर से वापस जयपुर के पास किसी गांव को वापस जाने का बताया। अब बारी मेरी थी मैंने भी पूछ लिया कि पढ़ाई कहां करते हो, उसने कहा कि नागपुर में छुट्टियों में पैसे कमाने आया था और स्कूल खुल गए हैं इसलिए गांव वापस जा रहा हूँ। नागपुर में समाज के कुछ लोग चाट का धंधा करते हैं उनके पास गया था। अब हम दोनों व्यक्तियों ने अलग ढंग से उसे तम्बाखू छोड़ने की समझाइश शुरू कर दी शायद एक घंटे से भी ज्यादा बात चली होगी। कुछ यात्री पहले से सो रहे थे कुछ थोड़ी देर में सो गए। इस बीच मेरे सहयात्री ने कहा कि तेरी पुड़िया इसलिए गिर गई क्योंकि मैं पुड़िया को घूर रहा था, मैं भगवान का भेजा एक दूत हूँ, भगवान नहीं चाहते कि तेरे जैसा अच्छा सुंदर लड़का खराब आदत में रहे। उसका लहजा भी लड़के जैसा ही था शायद वो जयपुर का ही रहने वाला था। लड़का ध्यान से सुनता जा रहा था। मैंने उसके पास एंड्रॉयड मोबाइल देख लिया था मैंने उसे एक सेल्फी लेने को कहा और फिर वाशबेसिन में जाकर अच्छे से कुल्ला करके आए ताकि दांतों में पहले खाए हुए तम्बाखू का कोई निशान या अंश न रह जाए। उसने ऐसा ही किया और वापस आकर बैठ गया। मैंने कहा कि अब एक सेल्फी दोबारा उसी जैसे ले और दोनों में तुलना करके देख। बीच बातों बातों में इंटरनेट से डाउनलोड की गई तम्बाखू से पीड़ित कैंसर मरीजों के मुंह के वीभत्स फोटो दिखाए। वो धीरे धीरे समझ चुका था कि अब उसे तम्बाखू नहीं खाना है। बाद में हम लोग सो गए मुझे जल्दी उठना था कोटा उतरने के लिए। जब सुबह कोटा स्टेशन पर उतरने लगा मेरा तम्बाखू विरोधी देवदूत उठ चुका था। हम दोनों ने ही लड़के सो सोते हुए देख और एक दूसरे को शाबाशी भरी नज़रों से देखकर राम राम कर विदा ली।
इससे पहले वाली यात्रा जिसे कोटा यात्रा के बाद पहली सक्सेस स्टोरी माना, उसे भी बता दूं। दिल्ली से इटारसी यात्रा करने वाले यात्री अकसर दिल्ली से शाम या रात को यात्रा प्रारंभ करते हैं। सो मैंने भी कर्नाटक एक्सप्रेस से रात को सवा नौ बजे नईदिल्ली स्टेशन से यात्रा प्रारंभ की। इसमें यात्रा करने वाले ज्यादातर यात्री सोने की तैयारी में रहते हैं। सिर्फ आगरा तक यात्रा करने वाले परिवार आपस में बतियाते जाते हैं। ऐसा ही एक परिवार जिसमें एक जॉब करने वाली बेटी और उसके माता पिता मेरी इस यात्रा मे आगरा तक सहयात्री बने। साइड लोअर सीट पर मां बेटी और मेरे सामने की लोअर सीट पर पिता थोड़ी बाद लेट गए थे। और मैं और मेरे साथ बैठा मिडिल बर्थ वाला यात्री अपने अपने मोबाइल टाइम पास कर रहे थे। मैं खिड़की से दूर यानि साइड लोअर बर्थ के निकट की ओर यानि मां बेटी की तरफ बैठा था। थोड़ी बहुत बातें मेरे कानों तक पहुंच रही थीं शायद बेटी की शादी की प्लानिंग उनका विषय था। इस बीच मेरी पहली सक्सेस स्टोरी ने शुरूआत कर दी। पिता ने बेटी को पुकार कर इशारे से कुछ मांगा। इशारा इसलिए किया होगा क्योंकि शायद उन्हें अपनी जुबान से तम्बाखू की डिबिया मांगने में शर्म आती। बहरहाल बेटी ने बर्थ के नीचे सामान टटोलकर डिबिया निकाली और पिता को थमा दी। मेरा ध्यान तब गया जब सीट के नीचे बैग निकालने की कवायद की, और मेरा भी सामान भी सामने की सीट के नीचे रखा था। सो बैग से निकली डिबिया पर भी ध्यान चला गया। पिता को डिबिया देने के कारण मेरा ध्यान बेटी पर बना रहा। बेटी ज्यों ही पिता को डिबिया देने के बाद मां के चेहरे की तरफ हुई मां के चेहरे पर आई नाराजगी मैंने पढ़ ली। वो नहीं चाहती थी कि पिता को तम्बाखू की डिबिया दी जाए और पिता भी इस बात को जानता था इसलिए उसने बेटी से ही इशारा करके डिबिया मांग ली। फिर क्या था मैंने बेटी से पूछा कि वो क्या करती है, किस कंपनी में है, पिता से बहुत प्यार करती हो आदि आदि और उसके बाद जो मैंने उससे कहा उसको सुनकर वो तीनों सन्न हो गए। मैंने बेटी को कहा कि तुमने अपने पिता को डिबिया देकर अच्छा किया उनका खूब ध्यान रखती हो। और कहा कि उनकी इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें डिबिया भी दे दी, अच्छा किया क्योंकि तम्बाखू खाने वाले कितना जिंदा रहेंगे पता नहीं, तुम्हारे पिता जब तक हैं ऐसे ही उनको तम्बाखू देती रहना। थोड़ी देर के बाद सन्नाटा तोड़ते हुए बेटी बोली आप मेरे पिताजी के लिए ऐसा कैसे कह सकते हैं। मैंने शांति के साथ उससे कहा कि तुम्हें तो पता ही होगा न कि तम्बाखू का सेवन जानलेवा है, तुम्हारी मां भी नहीं चाहती थी कि उन्हें डिबिया मिले फिर भी पिता की इच्छा पूरी करने के लिए जानलेवा तम्बाखू की डिबिया तुमने अपने हाथों से दी। मैंने क्या गलत कहा, जानलेवा चीज का सेवन करने वाला कितना जिंदा रहेगा कौन बता सकता है। मां ने बचाव करने की कोशिश की कि मैं तो इसलिए भी नहीं चाहती थी कि ये बात भी नहीं कर पाएंगे और थूकने के लिए टॉयलेट तक जाएंगे अच्छा नहीं लगता। लेकिन अब बात बेटी को समझ आ गई थी कि पिता की तम्बाखू उसे ही छुड़ाना है। मेरी पहली सक्सेस स्टोरी बन चुकी थी।
जिन्हें मैं जानता नहीं था और भविष्य में शायद कभी भी न मिल पाऊंगा उन्हें तम्बाखू छोड़ने या छुड़वाने के लिए पूरी तरह से प्रेरित करने में खुद को संतोष की स्थिति तक पहुंचाने की इन दोनों घटनाओं को मैं सक्सेस स्टेरी ही कहूंगा। मुझे पता नहीं कि बेटी ने पिता की तम्बाखू छुड़वाई कि नहीं या लड़के ने तम्बाखू छोड़ी कि नहीं लेकिन मुझे विश्वासपूर्ण लगता है कि मैं इनमें सफल ही रहा होऊंगा।

भारत भूषण आर गाँधी


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1 Comment

  1. Unsung hero. मेरी नजर में असली पूजा पाठ यही है। सेल्यूट

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