Devendra Soni October 16, 2019

क्या कोई भी सुखी नहीं है?

यह प्रश्न इसलिये हुआ कि व्यासजी को हम मानव जाति का गुरु मानते हैं।उनकी जयन्ती को”गुरु पूर्णिमा”के रूप में मनाते हैं।उनको साक्षात् नारायण मानते हैं-“व्यासो नारायणः स्वयम्”।और वे ही”देवी भागवत महापुराण “में यह स्पष्ट घोषणा करते हैं।देखिये:-

संसारेsस्मिन् महाभाग!
माया-गुण-कृतेsनृते।
तनुभृत् तु सुखी नास्ति
न भूत़ो न भविष्यति।।
–देवी भाग06/27/48

अर्थात् इस संसार मे जो माया के गुणों(सत्व,रज और तम)से बनाया गया है। जो मिथ्या(निरंतर परिवर्तनशील)है।

(ऐसे संसार में)कोई भी देहधारी सुखी नहीं है, नहीं रहा है और न कभी होगा।

बडा निराशा जनक उद्घोष करते प्रतीत हो रहे हैं व्यासजी महाराज इस श्लोक मे।जब तीनों कालों मे दु:खी ही रहना है, तब मानव जीवन का प्रयोजन क्या?

इसलिये चाणक्य ने इस विचार को अलग अंदाज में कहा है।

“धनेषु जीवितव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मसु।
अतृप्ताःप्राणिनःसर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च।।”

मुझे लगता है चाणक्य भी वही बात कह रहे हैं-केवल कहने की शैली बदल गयी है।

चाणक्य कोई सुखी नहीं है -ऐसा नहीं कहते।वे कहते हैं-कोई सन्तुष्ट नहीं है।और अपने पूरे जीवन में नहीं-केवल चार चीजों में।धन,आयु,स्त्री और भोजन का स्वाद-केवल इन चार पदार्थों में जीवन के अन्तिम क्षणों तक कोई भी व्यक्ति तृप्त नहीं हो पाता।

वास्तव में व्यासजी के श्लोक का यह चाणक्य-भाष्य है।वे व्यासोक्ति का कथ्य भाव यही मानते हैं।

इस श्लोक पर गहराई से ध्यान दें–
1-व्यासजी यह नहीं कह रहे हैं कि सभी लोग दुखी रहे हैं, दुखी हैं और दुखी रहेंगे।वे निषेधात्मक भाषा मे कहते हैं-सुखी नहीं हैं, नहीं रहे हैं और नहीं रहेंगे।इसलिए मैं समझता हूँ कि सुखी का आशय संतुष्टि से है।मानव स्वभाव है -प्राप्त स्थिति से संतुष्ट न रहना।और यही सांसारिक उन्नति का मूल भी है।

2-यह असंतोष-जन्य मानसिक पीडा भी सब को (प्राणी मात्र को)नहीं है-यह है केवल तनुभृत् यानी देहधारी को।
अर्थात् जो अपने को आकार(रूप)और नाम वाला मानता है-केवल उसे।

नाम और रूप का यही संसार मिथ्या है।यही माया-गुणों के उपादान से बना है।शुद्ध चेतना तो साक्षात ब्रह्म ही है ।
इसलिए शाश्वत आनंद प्राप्ति के लिए इस विकारी शरीर मे रहते हुए उस निर्विकार चेतना को उपलब्ध होना(आत्म-साक्षात्कार करना)ही मानव जीवन का परम पुरुषार्थ है।

इससे संसार नहीं मिट जाएगा।कुछ छोड़ना भी नहीं है।केवल नाटक करते समय(अभिनीत पात्र का सफल और सजीव अभिनय करते हुए )भी जैसे कलाकार अभिनेता को अपने वास्तविक रूप का भी बोध रहता है, जिसके कारण वह दु:खी होने का अभिनय करते समय भी अन्तर्मन से दु:खी नहीं होता ।उसी प्रकार आत्मसाक्षात्कार हो जाने पर यही भाव दशा मनुष्य को प्राप्त हो जाती है जिससे वह सदैव सुखी भी रहेगा, समाज और राष्ट्र की एकता तथा प्रगति मे भी सक्रिय सहभागी रहेगा।

मेरी दृष्टि मे यही भाव, यही संदेश जो चाणक्य ने कहा है- उक्त श्लोक का है।इसलिये ऐसा नहीं है कि कोई भी सुखी नहीं है। वरन व्यक्ति कुछ विशेष विषयों में संतुष्ट नहीं है।जो मानव जाति का वैशिष्ट्य है।यह असंतोष न होता तो हम आज भी प्रागैतिहासिक काल की स्थिति में ही होते।”असंतोषः श्रियो मूलम्”।

हांँ, असंतोष की अति भयावह दोष है।
यह मनुष्य के उचित अनुचित विवेक का हरण कर लेता है।जीवन नरक बन जाता है।

तो असंतोष विकास के लिये अपरिहार्य है।यही असंतोष एक मर्यादा के लाँघ जाने से पहले सर्वथा परिहार्य भी है।

अर्थात् सुखी वही है जिसका जीवन संतुलित है।

जगदीश सुहाने, दतिया

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