रांची झारखंड से पुष्पा सहाय की रचना -पूर्णता की तलाश

पूर्णता की तलाश

उड़ कर भी देखा आसमान में
तू छुपा था किस जहां में

पूर्णता को तलाशती
पूर्णता की ओर भागती
आठो याम चलती रही
सांँस मेरी फूलती रही

आशा निराशा से घिरी
कभी हंँसती कभी रोती रही
अपना जीवन अपूर्ण लिए
खुद को पाती कभी खोती रही

राह में साथी कोई मिल गया
देखो रास्ता कट गया
मेरा बोझ तो बँट गया
ह्रदय का भार हट गया

क्यों दर-दर भटकती रही
जब तू थी मेरे सामने खड़ी
सांँस देखो थम गई
ज्योतियाँ कुछ दिखने लगी

था वहाँ उजाला बहुत
उजाले को मैंने खींच लिया
पूर्णता को जैसे छू लिया
पर था क्या जीवन पूर्ण वहाँ ?

हौसलों को मजबूत किया
फिर से चलना शुरू किया
पूर्णता की तलाश में
फिर से उड़ना शुरू किया…

पुष्पा सहाय
रांची

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10 Comments

  1. पूर्णता को परिभाषित करती जीवन के विभिन्न आयामों से अंधेरों से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रयास सरहनीय एवं प्रसंसनीय है।

  2. वाह 👌 बहुत सुन्दर रचना, सुन्दर अभिव्यक्ति

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