Devendra Soni October 10, 2019

चिंता छोड़ सार्थक चिंतन की तरफ कैसे बढ़े…!

सचमुच अगर मै यह कहकर शुरुआत करूँ की जो लोग बुजर्ग कहते आएं है तो अतिश्योक्ति नही होगी की#चिंता चिता के समान होती है। मै खुद इसी दुविधा से गुजर रही हूँ जानती हूँ जो होना होगा वह होगा ही,कुदरती अनहोनी को आप टाल नही सकते ।रही बात अन्य जिंदगी की चिंताओं की तो यह भी हम पर है की हम उन्हें किस तरह से हैंडल करते है। मन अनियंत्रित इच्छाओं का वाहन है कई ख्वाहिशें और सपनो का सौदागर। जन्म से मृत्यु तक मनुष्य मोहपाश मे जकड़ा रहता है, जिस तरह पेट स्वाद नही मांगता जुबाँ का कसूर होता है ठीक उसी तरह जिंदगी हमसे कुछ नही माँगती यह जो हमारे 5 sense organs है ना यही जिम्मेदार होते है।आँखे नही होती तो हम तमाम गुण अवगुण को नजरअंदाज़ कर देते अच्छा बुरा हम इन्ही की बदौलत देखते है और फिर कई तरह की
भावनात्मक और देहात्मक समस्याएं बढ़ती है फिर वह प्रेम हो या अपराध।
दूसरे कान श्रवण शक्ति यह भी बड़ी भूमिका निभाता है अच्छा सुनना और बुरा सुनना यह भी चिंता को बढ़ाता है कहते है दीवारों के भी कान होते है इसमें दो राय नही।
तीसरा नाक यह चिंता की वजह नही है पर दंभ इसकी देन है फिर वह सामाजिक हिंसा हो या व्यक्तिक ,अहम का मुख्य स्त्रोत। चौथा दिल
व्यर्थ की संवेदनाओं से आहत, प्रेम स्वार्थ नफ़रत अपराधों की सारी श्रेणियाँ इसी की देन है और चिंता की वजह भी। पाँचवा दिमाग इंसानी शरीर का सबसे खतरनाक और शातिर अव्ययय। यह अपने इशारे से पूरी सृष्टि बर्बाद करने की हिम्मत रखता है और सृजन की ताकत भी,इसकी सोचने की ताकत ही हमे चिंता मे डालती है यह चिंतन से फ़लक तक पहुंचा भी सकता है तो चिंता से चिता तक भी। और सोच सकारात्मक नही होगी तो जाहिर सी बात है नकरात्मकता और विनाश निश्चित है।
सृष्टि का सबसे बुद्धिमान सृजन मानव यह समाज को देश को विश्व को बना सकता है तो नष्ट भी कर सकता है कहने का तातपर्य यही है की इंसानी सोच ही चिंतन मनन के साथ हम मनुष्यों को आगे बढ़ा सकती है।
कहते है माँ की गर्भ ही एक ऐसी जगह है जो सुरक्षित है, और जग जाहिर है हम पैदा होते है और उसी दिन से हम समस्याओं के मायाजाल मे फंस जाते है खुद सृजन करता भी चिंता में पड़ जाता है। देश के कई मुद्दे अपराधिक गतिविधियाँ,सत्ता जातिवाद हिंसा धर्म के नाम बंटवारें, सम्पति जायदाद के लिए अपनों की जिंदगी से खिलवाड़ ,वासनाओ की पूर्ति के लिए स्त्रियों पर हर तरह के अत्याचार, यह चिंता के विषय है।पर यह ना हो इसके लिए सकारात्मक सोच लानी होगी आज आधुनिकता के नाम पर कई आडम्बर होते है रोक हमीको लगानी होगी एक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा तभी शायद हम हर तरह की चिंता को छोड़ एक सकारात्मक चिंतन की तरफ़ जा सकेंगें ।अंत मे एक विश्वयुद्ध और होना चाहिए । इंसानी अभिव्यक्ति का विचारों का अपराधों का,इंसानी बंटवारे का जातिवाद का धर्म का।मतभेदों का ।यह देखना रोचक होगा की आखिर सदियों तक चलने वाले इन फ़िजूल मुद्दों में से जित कौन हासिल करता है?? चिंता का विषय है यह भी पर साकारत्मकता के लिए यह चिंतन मुझे लगता है बहुत बुरा तो नही है सोचें आत्मन्थन करें क्योंकि हम अमरत्व लेकर तो पैदा ही नही हुए जाना तो एक दिन हम सभी को है । फिर यह बेवज़ह की लालसा क्यों???

एक नयी सोच…..
हमारा घर हमारा शरीर है…
हृदय माँ…और दिमाग .. पिता…हाथ,पाँव,कान…हमारे सगे भाई हैं…आंख़ें और जिव्हा…सगी बहिनें…हैं….
पिता…जितना बुध्दिमान होगा घर उतना बढ़िया होगा…माँ…का ममत्व भी सदाबहार होगा….इस घर में मेहमान आते जाते रहते हैं….कुछ अनुकूल और कुछ प्रतिकूल…दोनों माँ और बाप के निर्देशों से ये घर चलता है…माँ…बाप प्यार से रहते हैं तो घर स्वस्थ रहता है…माँ बाप यदि झगड़ते रहते हैं…प्रतिकूल मेहमान हावी हो जाते हैं….
घर में एक हवन कुण्ड है…जिसे पेट कहते हैं…ये हवन दोनों समय नियमित चलता रहता है…जो घर की व्यलस्था के लिये ऊर्जा स्रोत प्रदान करता है….

इस हवन में पूरा परिवार नियमित रूप से माँ बाप के निर्देशानुसार भाग लेते हैं.।..

ये विचारों का तीरथ है…विचार अपनी दोनों प्रगाढ़ सम्बंधी … कामना और भावना के साथ अनवरत् भ्रमण करते रहते हैं, क्योंकि इस घर अखण्ड जाप चलता है…इसलिये उनका ये सिध्द तीरथ है…
सोचें और अमल करे।

सुरेखा अग्रवाल
#स्वरा
लखनऊ

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