Devendra Soni September 24, 2019

*इंसां ही रहने दो,रोबो न बनाओ *

दबाव और तनाव
एक हद तक सकारात्मक
हद से बढ़ जाए तो घातक
बच्चे ने बोलना सीखा
मां,मम, मम्मा कि हमने कहा
जरा गाना तो सुना।
उसे फुसलाया, ललचाया,
मौजी फिर भी न माना,
तो डराया, धमकाया।
धीरे धीरे वो अपनी बात भूल,
नुमाइश की टेप बना,
हर आते जाते को
हमारी फरमाइश पर
ट्विंकल ट्विंकल सुनाया।
वो जल्दी से बढ़ जाए,
सब दो दिन में पढ़ जाए,
सो छोटे से सिर पर
दो तीन ट्यूटर लगाया।
नैसर्गिक विकास भूल
गला काट रेस में
तांगे के घोड़े सा
आंखों पे उसके
एक अधखुला सा
ढक्कन चढ़ाया।
अब वो न जाने की
दांए दुनिया कैसी है।
अब वो न समझे की
बांए भी कोई बस्ती है।
बस आगे चलता है।
थकता पर न रुकता है।
खुद गिरता, खुद संभलता है।
हम खुश हैं कि
वो पढ़ दे रहा है,
वो बढ़ दे रहा है,
कितनी ही चढ़ाई
वो चढ़ दे रहा है।
इस चढ़ाई के बाद
खुद से, सबसे लड़ाई के बाद,
एक कागज का टुकड़ा
कुछ बड़ा या छोटा सा
हाथ उसके थमाया गया,
फिर छोड़ दिया गया
एक बीहड़ बियाबान में,
अबतक केवल आगे देखने को बाध्य
वो अब दसों दिशाओं में देखता है,
न अनुभव, न प्रशिक्षण,
दिशाहीन, दिग्भ्रमित सा,
गिरता संभलता सा
चल पड़ता है
किसी मंजिल की तलाश में।
किस्मत का साथ मिला
तो एक ठौर पाता है,
वरना गुमनाम गलियों,
अंधी सुरंगों में खो जाता है।
रह जाते हैं उसे गला काट दौड़ में
धकेलने वाले खैर ख्वाह।
हाथ मलते, सिर धुनते।

जैसे खुद जीया, उसको जीने दो,
नंगे पांव गलियों में खेले वो,
चढ़े पेड़ों पर, खेले डोलपात,
सूनसान देखकर के तलैया
कूद जाए, तैरे नंग-धड़ंग गात।
जी पाए दूसरों के ग़म और खुशियां,
बांट आए सबमें अपनी सौगात।
सबक सीख ले कि जियो और जीने दो,
खुद के साथ औरों की फटी भी सीने दो।
ऊपर से आया था इंसान बनकर,
अहसास करे, हंसे और रोए,
चलो आज इंसानियत उसमें बोएं।
गर सीख ले वो इस एक सबक को।
फिर क्या ग़म है,
बंगला हो न हो, गाड़ी हो न हो,
जिएगा अपनी जींदगी जी भर वो।
उसे इंसां ही रखो, रोबो न बनाओ।

सत्येन्द्र सिंह ‘सत्यार्थी’
स्वरचित , मौलिक

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