टूण्डला,फिरोजाबाद से डॉ. अनिल उपाघ्याय का14 सितम्बर हिंदी दिवस पर विशेष लेख

14 सितम्बर हिंदी दिवस पर विशेष

श्रृंगार न होगा भाषण से
सत्कार न होगा शासन से
यह सरस्वती है जनता की
पूजो, उतरो सिंहासन से

गोपाल सिंह ‘नेपाली’

किसी भी स्वाधीन देश के लिए जो महत्व राष्ट्र ध्वज , राष्ट्रगान का होता है वही महत्व राष्ट्रभाषा का होता है। किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषा व संस्कृति से होती है। राष्ट्र भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र के शब्दों में :

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति के मूल
बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय की सूल

भारत एक बहुभाषी देश है और यहाँ अलग – अलग राज्यों में अलग अलग भाषाएँ बोली जाती हैं। भारत में लगभग 463 भाषा एवं बोलियाँ बोली जाती हैं जिनमें से 14 भाषाएँ विलुप्त हो चुकी हैं। भारत सरकार ने 14 सितम्बर 1949 को हिंदी को राजभाषा घोषित किया। भारत में 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

वाशिंगटन विश्व विद्यालय के प्रो0 सिडनी कुलबर्ट के अनुसार आज विश्व में चीनी तथा अंग्रेजी भाषा के बाद तीसरे नम्बर पर हिंदी बोली जाती है। लगभग 60 करोड़ लोग हिंदी भाषा बोलते हैं। भारत के हर प्रांत में हिंदी बोली व समझी जाती है और देश की लगभग 77 प्रतिशत आबादी हिंदी बोलती है। हिंदी विश्व की उन सात भाषाओं में से एक है जिनका प्रयोग web add के लिए किया जाता है। आज संयुक्त राज्य अमेरिका के 45 विश्व विद्यालय सहित विश्व के 176 विश्व विद्यालयों में हिंदी पढ़ाई व सिखाई जा रही है। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसे 21वीं सदी की भाषा बताया । ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने भारतीय मूल के लोगों को दीपावली की शुभकामनाएँ हिंदी में देकर इसकी महत्ता को स्वीकारा।

आज विश्व में इंटरनेट पर फेसबुक ,ट्विटर व व्हाटसेप सहित अन्य सोशल मीडिया पर हिंदी का प्रयोग किया जा रहा है। हिंदी को लोकप्रिय बनाने में समाचार पत्रों , रेडियो , दूरदर्शन , फिल्म इंडस्ट्री का विशेष योगदान रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 1977 में संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण देकर राष्ट्रभाषा का परचम फहराया था।

अगर हम वैश्विक स्तर पर बात करें तो विश्व में लगभग 7000 भाषा व बोलियाँ बोली जाती हैं । इनमें से कुछ भाषाएँ तो विलुप्त हो चुकी हैं और कुछ विलुप्त होने के कगार पर हैं। एक सुप्रसिद्ध अमेरिकी भाषा विज्ञानी के अनुसार यदि हमने भाषाओं के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखाई तो सन् 2100 तक विश्व की लगभग 90 प्रतिशत भाषाएँ समाप्त हो चुकी होंगी या फिर विलुप्त होने के कगार पर होंगीं। ।

प्रश्न यह है कि भाषा कौन सी मरती है? भाषा वह मरती है जिसकी अपनी कोई लिपि नहीं होती, अपना साहित्य नहीं होता अथवा जिसके native speakers की संख्या तेजी से घट रही होती है। जब कोई एक भाषा मरती है तो केवल एक भाषा ही नहीं मरती उस भाषा का समूचा साहित्य मरता है, एक संस्कृति मरती है।

कुछ लोगों में यह भ्रम है कि अंग्रेजी के कारण भाषाएँ दम तोड़ रही हैं। सुप्रसिद्ध अमेरिकी भाषाविद डेविड क्रिस्टल ने ‘Development Forum’ नाम की पत्रिका में ‘Language Death’ नाम से एक आर्टीकल लिखा था जिसमें यह बताया गया था कि विश्व में जो भी भाषा मर रही है उसका कारण अंग्रेजी नहीं। भाषा के मरने के अपने अलग- अलग कारण होते हैं कोई अन्य भाषा नहीं।

जो लोग यह सोचते हैं कि अंग्रेजी के कारण हिंदी को खतरा है, हिंदी दम तोड़ देगी वे ‘ फूल्स पेराडाइज’ में रह रहे हैं। जिस भाषा के नेटिव स्पीकर्स की संख्या 60 करोड़ से अधिक है, जिस भाषा में ‘राम चरित मानस’, ‘साकेत’, ‘कामायनी’ जैसी कालजयी कृतियाँ लिखी गई हों जिसे लोग इक्कीसवीं सदी की भाषा कह व मान रहे हैं उस भाषा के अस्तित्व को कहीं कोई खतरा नहीं। वस्तुस्थिति यह है कि आज हिंदी के बढ़ते वर्चस्व के कारण कई भाषाओं पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जब कोलंबिया में बोली जाने वाली भाषा Totoro केवल चार नेटिव स्पीकर्स , Lipan Apache भाषा दो व नाइजीरिया में बोली जाने वाली भाषा Bikya एक नेटिव स्पीकर के दम पर आज भी जीवित हैं तो फिर 60 करोड़ से अधिक नेटिव स्पीकर्स की भाषा हिंदी को कहाँ व कैसा खतरा?

डाॅ0 अनिल उपाध्याय
97/5 शांति विला
नई बस्ती, टूण्डला ( फिरोजाबाद)
उत्तर प्रदेश
संपर्क :9412815392

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