गोवा से प्रज्योत गावकर की रचना – ग़ज़ल हो गए

*ग़ज़ल हो गये*

तुम जो यों सामने आयी तो ग़ज़ल हो गये
पहले से थे आधे पागल पूरे पागल हो गये

चंद लफ़्ज़ दिल ने गुनगुनाये थे तुम्हारे बाद
आह निकली तो लोग उसे भी वाह कह गये

जीत के बाद लोग तारिफ़ जमकर करते रहे
पिछे देखा तो आँखों से समंदर बहने लग गये

कौन समझ पाया है इस मरीज़ का हाल
जो भी मिलने आये अपना हाल सुना गये

कल तक लोग मुझसे इज़्ज़त से पेश आते थे
मेरी कश्ति डूबते ही मंज़र देख हँसने लग गये

अपनी जिंदगी मैंने खुद ही बर्बाद की है
यहाँ हम बेवजह दूसरों को दोष देते रह गये

दिल के अंदर ही रह गयी दिल की कुछ बातें
जब से हम उसके दिल से जुदा हो गये

शिद्दत से याद करना नहीं पड़ता अब किसी को
दिल तोड़ने वाले जब से मेरे दिल में ही बस गये

हम तरक्क़ी के लिए भागते रहे जिंदगी भर
इस कशमकश में सारे रिश्ते ठंडे पड़ गये

अपनों के बावजुद हर तरफ यहाँ तनहाई है
बुलंदी की इस चकाचौंद में हम अकेले रह गये

मेरे लफ़्ज़ अल्फ़ाज़ों में बस तुम ही तुम हो
अफ़सोस कि तुम मेरी लिखावट में ही रह गये

प्रज्योत गावकर
ठाणे, सत्तरी -गोवा
Ph. ७५८८९२१५९३

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