जयपुर से कुन्ना चौधरी की रचना – ऐनक

ऐनक

काश एक जादुई ऐनक मिल जाती तो बदल जाता नज़रिया ,
धुँधली आँखों पर से छँट जाती दुनिया के फ़रेब की बदरिया ….

हम भी सह लेते बेवफ़ाई की धूप लगा कर काली ऐनक ,
मुस्कुरा कर बना लेते उसे भीगी पलकें छुपाने का ज़रिया …..

डूबते सूरज की लाली को मान लेते नई सुबह की शुभकामनायें ,
दिल की बंजर भूमी पर उगा लेते उम्मीदों की फुलवारियाँ…

बीच भँवर में छोड़ जाने का ग़म यूँ ना करता परेशान ,
ऐनक के सुनहरे शीशे में खोज लेते हम अपनी नई डगरिया …

चलती सांसे कह रही जीवन में अभी बहुत कुछ है बाक़ी ,
क्यों अवसादों में रहे डूबे ,हौसलों की ऐनक लगा बदलें अपना नज़रिया ….

कुन्ना चौधरी, जयपुर

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